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🙏राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के द्वारा सरकार शिक्षा में जो सुधार लाना चाहती है,वही सुधार शिक्षाविद् श्री सोनम वांगचुक अपने शिक्षा के सत्याग्रह द्वारा लाना चाहते हैं।दोनों की मंजिल एक है, फिर विरोध क्यों?-एक दृष्टि🔥


संवाद


'शिक्षा का सत्याग्रह'


शिक्षाविद् श्री सोनम वांगचुक के अनशन के कारण पहली बार शिक्षा भारत का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। शिक्षा का सत्याग्रह शुरू कर उन्होंने शिक्षा और परीक्षा पर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया है। उनका अनशन प्राणघाती न हो जाए इसकी चिंता सभी शिक्षाविदों को हैं। अतः सरकार द्वारा हाईकोर्ट के निर्देश के आलोक में अनशन स्थल से उनको हटा लेना एक तरफ बुरा भी लग रहा है तो दूसरी तरफ अच्छा भी लग रहा है। बुरा इसलिए लग रहा है कि इसमें जबरदस्ती थी और अच्छा इसलिए लग रहा है कि उनकी जान को अब कोई खतरा नहीं होगा।


             गंगा संरक्षण आंदोलन को समर्पित महान पर्यावरणविद् प्रो.जी.डी.अग्रवाल 111 दिनों के अनशन के बाद 2018 में हमारे बीच से परमात्मा के पास चले गए तब से एक गहरा सवाल मन में उठता है कि किसी महान उद्देश्य के लिए जीने वाले लोगों को मरने की हद तक क्यों जाना चाहिए या क्यों जाने दिया जाए? सत्याग्रह का प्रयोग गांधी ने अद्भुत रूप से किया। अपने व्रत,उपवास और अनशन के द्वारा वे अपनी मांग को एक तरफ जनता तक पहुंचाकर जनजागरण फैला देते थे और दूसरी तरफ सरकार तक पहुंचाकर उसे सावधान भी कर देते थे। उस समय तो भारत परतंत्रता काल में जी रहा था और विदेशी ब्रिटिश सरकार थी, अब तो भारत स्वतंत्रता के अमृत काल में जी रहा है और अपनी सरकार है; फिर क्यों किसी महान पर्यावरणविद् को मरना पड़ता है और महान शिक्षाविद् को मरणासन्न तक पहुंचना पड़ता है?


                 इस संदर्भ में एक बात हम सभी को समझनी पड़ेगी कि पर्यावरण और शिक्षा जैसे विराट मुद्दे की समस्याओं का समाधान किसी एक से संभव नहीं है। जन-जन की भागीदारी और सरकार की जिम्मेदारी से ही पर्यावरण और शिक्षा की समस्याओं का समाधान ढूंढा जा सकता है।


श्री सोनम वांगचुक ने लद्दाख में 'ऑपरेशन न्यू होप' और अपने संगठन SECMOL के द्वारा जो शिक्षा के क्षेत्र में महान परिवर्तन किया उसमें जन भागीदारी के साथ सरकारी सहयोग भी था। सुधार का एक विचार अवश्य ही किसी महान मस्तिष्क में आता है किंतु वास्तविकता के धरातल पर वह विचार जनता और सरकार दोनों के सहयोग से कार्य रूप में उतर पाता है।


                भारत का यह सौभाग्य है कि महान मस्तिष्क और विराट हृदय वाली आत्मा हमारे बीच में किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाती है। वे अपनी योजना को जनता और सरकार के सहयोग से किसी क्षेत्र विशेष में सफल भी बना देते हैं। जनता की यह जिम्मेवारी है कि ऐसी महान आत्माओं के कार्यों को गहराई से जाने और सरकार की यह जिम्मेवारी है कि ऐसी महान प्रतिभाओं को सुने,समझे और उनके मार्गदर्शन में कार्ययोजना बनाए।


            राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जिस उद्देश्य से लाई गई है, उस उद्देश्य को श्री सोनम वांगचुक ने लद्दाख में कार्यरूप में पहले ही परिवर्तित करके दिखा दिया है। वहां उन्होंने ऐसा शिक्षा मॉडल स्थापित किया जो विद्यार्थियों को रटने के स्थान पर सोचने और समझने को प्रेरित करती है। असफल विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक विद्यालय स्थापित करके उन्होंने उन्हें सफल ही नहीं सुफल भी बनाकर दिखाया। स्थानीय भाषा और संस्कृति से शिक्षा को जोड़कर उन्होंने उसमें जान फूंक दी। उनका संदेश था कि असफलता प्रतिभा की कमी से नहीं बल्कि शिक्षा के प्रयोग की सीमा से उत्पन्न होती है। आज अपने आप को असफल मानकर जब विद्यार्थी अवसाद में जा रहे हैं और आत्महत्या तक कर रहे हैं तो श्री सोनम वांगचुक के प्रयास को गहराई से सुनने,सोचने,समझने और प्रयोग करने की जरूरत है।


            उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हिमालयी क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नवाचार,सतत विकास, जलवायु,तकनीक और उद्यमिता आधारित शिक्षा का मॉडल उन्होंने HIAL की स्थापना कर विकसित किया।ऐसी सृजनशील और संवेदनशील आत्मा के प्रभाव से शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन किया जा सकता है।


              उदाहरण के तौर पर राजस्थान का बांसवाड़ा जिला जो शैक्षिक दृष्टिकोण से पिछड़ा माना जाता है किंतु प्राकृतिक दृष्टिकोण से बहुत समृद्ध है ; आदिवासी बहुल इस क्षेत्र के शैक्षिक विकास के लिए श्री सोनम सर के प्रयोग को आजमाया जाना चाहिए। जब विद्यार्थियों के लिए शिक्षा अनाकर्षक और भार हो गई हो तो उस शिक्षा को विद्यार्थियों के लिए आकर्षक और अनुकूल बनाया जाना चाहिए। जब शिक्षा उनको प्रकृति से और जीवन से जोड़ेगी, उनकी स्थानीय भाषा और संस्कृति के अनुरूप होगी तो वीरान होते जा रहे शिक्षा-संस्थान गुलजार हो सकते हैं। अभी तो शिक्षकों की प्रतिभा सिर्फ सूचना जुटाने के काम आ रही है, जब वह प्रतिभा जीवन


निर्माण के काम में लगेगी तो बांसवाड़ा शैक्षिक दृष्टिकोण से भी अग्रणी क्षेत्र में गिना जाएगा।


                भारत में कभी आर्थिक क्रांति हुई तो कभी राजनीतिक क्रांति हुई किंतु वास्तविक बदलाव नहीं आया। वास्तविक बदलाव तो शिक्षा की क्रांति से ही आ सकता है। शिक्षा की क्रांति जब हुई थी तब कभी भारत विश्वगुरु बना था, आज शिक्षा के सत्याग्रह द्वारा जब वह क्रांति दरवाजा खटखटा रही है तो सरकार और जनता दोनों को अपने दरवाजे खोलने चाहिए क्योंकि यह भारत के भविष्य से जुड़ा मसला है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹