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🙏शिक्षा सपने जगाती है और परीक्षा सपने को पूरा करने का मौका देती है। व्यवस्था का काम है यह देखना कि शिक्षा और परीक्षा बिके नहीं। यह घोर पाप हुआ है जिसके कारण तरूणों ने आत्महत्या की।अब तरूणों के साथ उनके मां-बाप और समाज भी सड़कों पर समाधान की आशा में हैं-एक दृष्टि🔥


संवाद


'तरुणाई के सपने'


भारत की तरुणाई आज सड़कों पर हैं। उन्हें अपने सपने टूटते दिखाई दे रहे हैं। अपनी प्रतिभा और परिश्रम के बल पर जिस सपने को साकार करने वे निकले थे, वे सपने बेचे जा रहे हैं और खरीदे जा रहे हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य किसी भी देश के लिए नहीं हो सकता।


           गरीब घर के बच्चों के पास जो सबसे बड़ी संपत्ति होती है- वह संपत्ति होती है उनके सपने। शिक्षा उनके सपनों को जगाती है और व्यवस्था उनके सपनों को पूरा करने का भरोसा दिलाती है। लेकिन जब सपने जगाने वाली शिक्षा उनकी पहुंच से बाहर हो जाए और सपने को पूरा करने वाली व्यवस्था उनके दुख-दर्द को समझ नहीं पाए तो वे हताशा-निराशा में स्वाध्याय की साधना-स्थली को छोड़कर सड़कों पर आने को मजबूर हो जाते हैं।


            अपनी तरुणाई के दिनों को याद करता हूं तो 'दो रोटी कम खाएंगे,किताब नई लाएंगे' का नारा आंखों में तैरने लगता है। इस नारे के साथ गरीब घरों के हमारे साथी गांवों से शहरों में आकर कम से कम सुविधाओं के बावजूद ऊंचे से ऊंचे सपने देखने का साहस कर रहे थे। मां-बाप के अभाव भरी जिंदगी को दूर करने के लिए जो सपने हम देख रहे थे,उन सपनों को पूरा करने में व्यवस्था सहयोगी साबित हो रही थी। समय पर परीक्षा होती थी,रिजल्ट आते थे;फिर किसी एक की सफलता को देखकर बाकी साथियों के आशा के दीप जल जाते थे।   


            निम्नमध्यमवर्गीय परिवारों के हम जैसों के पास पैसे कम थे किंतु दिलों में उमंग और उत्साह बहुत ज्यादा था। इस कारण हम अमीर घर के बच्चों से भी ज्यादा प्रसन्न रहते थे। हमारे शिक्षक और सीनियर्स भी ऐसे थे जो हमारे सपनों को जगाए रखते थे और अपने ज्ञान और मार्गदर्शन से अंधेरी रातों में राह दिखाते रखते थे।


              उस समय हमारे समूह से जिन लोगों ने भी ईमानदारी से परिश्रम किया,उन सबने अपनी प्रतिभा के अनुसार अपना फल भी पाया।न कभी कोई परीक्षा रद्द होती थी और न पेपर लीक होता था। सरकारी शिक्षालयों से पढ़कर कम से कम पैसे से हमारे समूह में बहुत सारे साथियों ने बड़े सपने देखे थे।वे सपने पूरे हुए और उन्होंने अपने अभाव झेल रहे घरों को सहयोग देकर अपने जीवन की सार्थकता पाई।


         ऐसे अभाव वाले घरों से निकलकर जब हम सभी ने पढ़ाई की बदौलत नौकरी पा ली तो अपने बच्चों के लिए कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा उनकी पढ़ाई में लगा दिया। सरकारी शिक्षालयों पर भरोसा नहीं रहा तो निजी शिक्षालयों ने और कोचिंग संस्थानों ने एक तरफ कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खा लिया और दूसरी तरफ बच्चों की जिंदगी को एक मशीन की तरह बना दिया। न खेलना,न कूदना, न दोस्तों के संग मस्ती करना और न रिश्तेदारों के यहां जाना।शिक्षालय से आकर ट्यूशन क्लास में जाना और फिर बड़े होने पर महंगे कोचिंग संस्थानों में कैद हो जाना। अब पैसे थे लेकिन उन पैसों से अपने बच्चों के लिए  शिक्षा कम,तनाव ज्यादा खरीदा जा रहा था।


           इधर कुछ सालों से तो हद हो गई। सरकारी शिक्षालय कार्यक्रमों के प्रयोगशाला हो गए और निजी शिक्षालय शिक्षा के नाम पर भारी ट्यूशन फीस वसूलने लगे। आईआईटी और नीट जैसी परीक्षाओं के लिए तो कोचिंग के अलावा कोई विकल्प ही नहीं रहा। मूल शिक्षालय डमी हो गए और कोचिंग प्राथमिक हो गया। अन्य दूसरी छोटी बड़ी परीक्षाओं के लिए भी कोचिंग कल्चर ने शिक्षा को पूरा व्यवसाय बना दिया। ऐसे में पेपर लीक की घटनाओं ने नई पीढ़ी की आंखों के सपने छीन लिए।


              प्रतिभा और परिश्रम के बावजूद अपने सपनों को टूटता देखकर विद्यार्थी अवसाद में जाने लगे और आत्महत्या करने लगे। सरकारी नौकरियां कम होने लगीं, पेपर लीक ज्यादा होने लगे, व्यवस्था से भरोसा उठने लगा और राजनीति इसका परिणाम समझ नहीं सकी।


            विद्यार्थियों के साथ 30 वर्षों से सतत संवाद करके इस अंधेरी रात में एक प्रकाश की किरण मुझे  दिखाई दे रही है। शिक्षा जीवन का मौलिक अधिकार है और कोई भी सरकार इससे मुख नहीं मोड़ सकती है। शिक्षा के द्वारा ही तरुणाई के सपने को फिर से जगाया जा सकता है और सही व्यवस्था के द्वारा उन सपनों को पूरा करने का विश्वास वापस लौटाया जा सकता है।   


            कलाम साहब कहते थे कि छोटा सपना एक अपराध है। कोचिंग वाली और पेपर लीक वाली व्यवस्था ने तो गरीबों के सपने ही छीन लिए। ऐसे में कोई बड़े सपने कैसे देखे? किंतु सपनों के बिना कोई भी तरुणाई अमीर नहीं होती। सपने देखने की कला तो शिक्षा और शिक्षक सिखाएंगे किंतु सपनों को पूरा करने की व्यवस्था तो सरकार ही देगी।


              सपनों के टूटने से अंधेरे में भटक रहे तरूणों के लिए एक संदेश है-


'खुले नयन से सपने देखो,बंद नयन  से अपने


सपने तो रहते हैं बाहर , भीतर रहते अपने।'


         युवाओं को आंखें खोलना होगा और बदलती हुई दुनिया के अनुसार नए सपने बुनना होगा। हमारे समय में सरकारी नौकरियां पर्याप्त मात्रा में थीं वह आज नहीं है, इस हकीकत को समझना होगा। सरकारी नौकरियां कम हुई हैं तो एआई के जमाने में नए-नए क्षेत्र खुल गए हैं। बाहर के जगत पर दृष्टि रखनी होगी और इसके साथ-साथ स्वयं पर भी दृष्टि रखनी होगी। इसलिए ज्ञान के साथ ध्यान को भी जीवन में अपनाना होगा।


         कम से कम पैसों में अच्छी से अच्छी जिंदगी जीने की कला हमारी संस्कृति ने सिखाई है,उसको जानना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा के 'सादा जीवन उच्च विचार' के आदर्श को अपनाना होगा। नरेंद्र नाथ दत्त भी अपनी तरुणाई में पिता के मरने के बाद नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। ऐसे समय में उनके गुरु श्री रामकृष्ण ने उनको मानवता की सेवा का विराट स्वप्न दिया जिसने उन्हें विवेकानंद बना दिया।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹