युवाओं की जीत के मायने
July 26, 2026🙏युवाओं की आत्महत्या से दहला हुआ देश आज युवाओं की जीत पर गर्व महसूस कर रहा है। ऐसे में 'युवा' और 'जीत' पर भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि को जानना चाहिए-एक विश्लेषण 🔥
संवाद
'युवाओं की जीत के मायने'
भारत युवाओं का देश है।यह बात संख्यात्मक दृष्टिकोण से कही जाती थी क्योंकि कुल आबादी का 65% लोग युवा हैं किंतु अब आगे गुणात्मक दृष्टिकोण से भी भारत को युवा मानना पड़ेगा। परंपरावादी सोच को दरकिनार करके जब क्रांतिकारी सोच कोई देश अपनाता है तो वह गुणात्मक दृष्टिकोण से युवा देश कहा जाता है।
कठोपनिषद में 7 वर्ष का नचिकेता जब 70 वर्ष के अपने पिता को बूढ़ी गायें दान में देने पर टोकता है कि 'यह कैसा दान है?',तब यह युवा चित्त का लक्षण है। कलाम साहब जब राष्ट्रपति भवन को भी शिक्षालय में तब्दील कर देते हैं और 83 वर्ष की उम्र में शिक्षा पर व्याख्यान देते हुए अंतिम सांस लेते हैं तो यह युवा चित्त का लक्षण है। 59 वर्ष के श्री सोनम वांगचुक जब शिक्षा में सुधार के लिए युवाओं के समर्थन में 26 दिनों का उपवास करते हैं और उन्हें शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन के लिए प्रेरित करते हैं तो यह युवा चित्त का लक्षण है। भारतीय संस्कृति ने सत्यम् शिवम् सुंदरम् की राह पर चलने वाले को युवा माना है चाहे उसकी शारीरिक उम्र कितनी भी हो।
कॉकरोच कहे जाने पर जब युवा इस चुनौती को स्वीकार करते हुए अपमान रूपी विष को भी अमृत बना देते हैं तो यह युवा चित्त का लक्षण है।धर्म,जाति,क्षेत्र,भाषा, लिंग इत्यादि की संकीर्ण दीवारों को गिराकर जब एक साथ जो भी शिक्षा के मुद्दे को उठाते हैं तो वे सभी युवा हैं। जब सरकार अपना अहंकार छोड़कर संवेदनशील और संवादशील राहों पर कदम बढ़ाती है तो यह युवा चित्त का लक्षण है।
परीक्षा में पेपर लीक का मुद्दा तो धड़ के समान है जो जमीन के ऊपर दिखाई दे रहा है, मुख्य मुद्दा तो शिक्षा में चरित्र का लोप हो जाना है जो जड़ के समान जमीन के अंदर है और सभी को दिखाई नहीं दे रहा है।धड़ से ज्यादा महत्वपूर्ण जड़ है। अन्यथा 'सत्यमेव जयते' को अपना राष्ट्रीय वाक्य घोषित करने वाला देश इतना ज्यादा झूठ के रास्ते पर आगे नहीं बढ़ता। विष पीने के कारण शिव को देव से महादेव बनाने वाला देश सिर्फ धन,पद,प्रतिष्ठा के पीछे पागल होने वालों को अमृत काल का प्रतिनिधि नहीं मानता। आत्मा के सौंदर्य को सर्वश्रेष्ठ सौंदर्य मानने वाला देश तन के सौंदर्य के पीछे भागकर इतना आत्महीन नहीं होता।
शिक्षा में क्रांति के कारण भारत कभी विश्वगुरु बना था, उस शिक्षा में क्रांति की ओर यदि भारत कदम बढ़ाता है तो भारत के युवाओं की सबसे बड़ी जीत मानी जाएगी। सरकारी शिक्षालयों में जब विद्यार्थियों की उपस्थिति से क्लास गुलजार होंगे और शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्यों से मुक्त कर सिर्फ शैक्षिक कार्यों में उनका सदुपयोग किया जाएगा तब भारत की जीत मानी जाएगी । भारत के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तो प्राथमिक कदम है। किसी के इस्तीफा से समस्या का समाधान नहीं होता। असली सवाल यह है कि शिक्षा की समस्याओं का समाधान करने वाला शिक्षा मंत्री भारत को चाहिए।
भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है किंतु भारत की प्रचलित राजनीति ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि भारत ब्रेन ड्रेन वाला देश बन गया है। यहां की प्रतिभाएं विदेशों में पढ़ने जाती हैं और विदेशों में अपनी प्रतिभा का भविष्य देखती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सीजेपी की स्थापना करने वाले अभिजीत दीपके हैं जो अमेरिका में पढ़ाई कर रहे थे।उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पार्टी की स्थापना करके भारत के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे को जन जन का मुद्दा बना दिया। सोशल मीडिया पर जो उन्होंने विद्यार्थियों की बेरोजगारी,बेबसी औरआत्महत्या का मुद्दा उठाया,वह भारत के अचेतन मन में गूंज रहा था। बस उन्होंने उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति पहले 'कॉकरोच जनता पार्टी' बनाकर सोशल मीडिया पर कर दी जिसको अभूतपूर्व फॉलोअर्स मिल गए और बाद में भारत में आकर जंतर मंतर पर धरना देकर सबको आंदोलन से भी जोड़ लिया।
फिर इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए शिक्षाविद् श्री सोनम वांगचुक आगे आ गये और अपने उपवास के द्वारा भारत की आत्मा को जगा गए। उन्होंने शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में अपने जीवन को समर्पित करके जो काम कर दिखाया है, वह भारत के लिए अनुकरणीय और अनुसरणीय है। श्री सोनम वांगचुक जैसी प्रतिभा का व्यक्ति यदि भारत का शिक्षा मंत्री बनता है तो भारत जैसे युवा देश की असली जीत होगी।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे 🙏🌹