कहां हैं गुरु और उनका कुल?
July 29, 2026🙏ऊं श्री गुरवे नमः🙏
शिक्षा और परीक्षा पर संसद में चर्चा हो रही है। गुरु पूर्णिमा के आलोक में एक यक्षप्रश्न उपस्थित हुआ है कि जीवन देने वाली शिक्षा और परीक्षा जीवन लेने वाली क्यों हो गई?-एक दृष्टि🔥
संवाद
'कहां हैं गुरु और उनका कुल?'
गुरु पूर्णिमा के आलोक में विश्व गुरु भारत जब अपने अतीत को याद करता है तो गर्व से मस्तक ऊंचा हो जाता है और जब वर्तमान को देखता है तो शर्म से सर झुक जाता है। भारतीय संस्कृति का 'गुरु' जैसा महिमावान शब्द विश्व की किसी अन्य संस्कृति में नहीं है किंतु भारत में आज उस गुरु जैसा उपेक्षित व्यक्तित्व भी दूसरा नहीं है।
इसका मूल कारण यह है कि एक समय भारत की राजनीति अंधकार को हटाने वाले गुरु के बताए रास्ते पर चलती थी, आज उस भारत के आधुनिक गुरु राजनेता से अपनी पहचान और ज्ञान को प्रमाणित करवाते हैं।
राज्य को चलाने वाली राजनीति भारतीय दर्शन परंपरा में जीवन को चलाने वाली शिक्षा नीति के अधीन होती थी किंतु आज राजनीति भारत की शिक्षा नीति को निर्धारित और निर्देशित करती है। परिणाम यह होता है कि राजनीतिक विचारधारा बदलते ही शिक्षा की पूरी धारा बदल जाती है।पश्चिम और पूरब में अंतर यही है। पश्चिम राजनीति को सबसे ऊंचा स्थान देता है जबकि पूरब गुरु निर्दिष्ट शिक्षा नीति को सबसे ऊंचा स्थान देता था।
ऐसे में गुरु पूर्णिमा का महत्त्व और बढ़ जाता है जिसे आषाढ़ मास में हम मनाते हैं। जीवन का आकाश आज काले बादलों से घिर गया है। हमने ऐसी शिक्षा व्यवस्था ईजाद की है जिसकी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी आत्महत्या कर रही है और जो बच जाती हैं वो अवसाद में जा रही हैं।
हमारे भारत का गुरु ऐसी पीढ़ी तैयार करता था जो जंगल में भी मंगलमय जीवन जीता था। राम और कृष्ण का जीवन इसका प्रमाण है। गुरु स्वयं जंगल में एकांत में साधना करता था और कम से कम सामान में जीवन जीने की कला देकर नई पीढ़ी को बड़ी से बड़ी आत्मा वाला इंसान बना देता था। प्रतिकूल परिस्थितियां कितनी भी हों,उसमें अनुकूल मन:स्थिति निर्माण करने की कला हमारी शिक्षा देती थी।
आधुनिक भारत में नरेंद्र नाथ दत्त के जीवन में भी प्रतिकूल परिस्थितियां आईं किंतु गुरु रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव से उनकी ऐसी मन:स्थिति बनी कि वे परिस्थितियां अनुकूल हो गईं। वे न तो अवसाद में गए और न आत्महत्या की बल्कि उनमें विवेक और आनंद का जन्म हुआ। विवेकानंद का जीवन दर्शन कहता है-
'न फिक्रे गुरबत है, न अंदेशाए तन्हाई है
जिंदगी इतने हवादिशों से गुजर आई है
जिस हाल में लोग मरने की दुआ करते हैं
उस हाल में मैंने जीने की कसम खाई है।'
जंतर मंतर पर जेन जी ने अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जितनी अनुकूल मन:स्थिति दिखाई है, वह यही बताती है कि वे मरना नहीं जीना चाहते हैं। वहां भी एक गुरु श्री सोनम वांगचुक अपने जीवन और शिक्षा से मार्गदर्शन दे रहे थे जिसके परिणामस्वरूप कुछ अपवादों के बावजूद बहुत सृजनशीलता के दर्शन हुए हैं।
आज भी भारत में ऐसे गुरु हैं जो जीवन के आकाश पर छाए हुए अंधकार को अपने ज्ञान से दूर करने में समर्थ हैं। किंतु उन गुरुओं को हमने भुला दिया है। आज गुरु के नाम पर कोचिंग गुरु,राजनीतिक गुरु सब जगह छा गए हैं। भारतीय संस्कृति का वह गुरु जो जीवन की परीक्षा पास करवा देता था, वह दिखाई नहीं देता।
उस गुरु को यदि भारत ढूंढकर सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं करता है तो संसद में शिक्षा और परीक्षा पर हो रही चर्चा कभी सार्थक नहीं हो सकती। गुरु पूर्णिमा के आलोक में हमें यह स्पष्ट दिखाई देना चाहिए कि सिर्फ आजीविका देने वाली शिक्षा और परीक्षा से आज अवसाद व आत्महत्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में जीवन देने वाली शिक्षा और परीक्षा की गुरुकुलीय प्रणाली को प्राथमिक बनाना होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 गुरुकुलीय प्रणाली की तो बात सिद्धांतों में खूब करती हैं किंतु व्यवहार में गुरु और शिष्य के बीच की दूरी बहुत बढ़ गई है।गुरु और शिष्य का हार्दिक संबंध आज की शिक्षा व्यवस्था में सिर्फ कागजी संबंध बनकर रह गया है। क्या कागज के फूलों से असली फूलों वाली सुगंध आ सकती है?
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹