🙏विश्व को संस्कृत सूक्तियों का ध्येय वाक्य देने वाला भारत सार्वजनिक रूप से इतना असंस्कृत और अश्लील भाषा का प्रयोग करेगा, कभी सोचा नहीं था। भाषा की विकृति पर एक अंतर्दृष्टि🔥


संवाद


'संस्कृति विकृति की ओर कैसे बढ़ी?'


कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा ने देश का एक नया रूप हम सभी के सामने में उपस्थित किया है।शीर्षस्थ नेतृत्व के लिए युवा जितना आक्रामक और अश्लील भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह सोच से परे है। खासकर युवतियों की भाषा सार्वजनिक रूप से इतनी जुगुप्सात्मक और सीमा के पार हो जाएगी,कभी सोचा नहीं था।


              समाज का मवाद बाहर आ रहा है,जरूर ज़ख्म बहुत गहरा और बड़ा है। जिस सरकार के विरुद्ध बोलने के पहले लोग दस बार सोचते थे, उस सरकार के विरुद्ध ऐसे मीम्स बनाए जा रहे हैं और ऐसी गाली दी जा रही हैं जिसे संभावित परिणामों को देखकर विचारपूर्वक कृत्य नहीं कहा जा सकता। लगता है कि भावना की तीव्रता और आवेग नियंत्रण में नहीं रहा।


                     शिक्षा का काम है कि इस अप्रत्याशित मनोवैज्ञानिक स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण करे ताकि मूल कारण तक पहुंचा जा सके।


           जाने अनजाने एक भय का वातावरण समाज में निर्मित हुआ। धर्म के आधार पर एक वर्ग अपने को असुरक्षित और भयभीत महसूस करने लगा तो दूसरा वर्ग अहंकार और आक्रामकता से भर गया। महापुरुषों के लिए अश्लील और आपत्तिजनक बातें की जाने लगीं। आदर्शों को आपत्तिजनक अवस्था में दिखाया जाने लगा ताकि उनसे प्रेरणा पाने वालों को नीचा दिखाया जा सके-


'आस्था के जब सारे आधार गिराओगे


सर झुकाने फिर किस दर जाओगे?'


            ऐसी बातों के आलोचकों को आक्रामक तरीके से ट्रोल आर्मी द्वारा चुप रहने पर मजबूर कर दिया गया। हेट स्पीच देने वालों का हौसला बढ़ता गया और समाज में अनेक आधार पर पर गोलबंदी बढ़ती गई।सरकारी दावों और जमीन पर वास्तविक स्थिति के बीच बहुत बड़ा अंतर होता गया। घृणा को वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एक राजनीतिक हथियार बनाया गया।


             बिगड़ते सांप्रदायिक सद्भाव के माहौल में दूसरे पक्ष द्वारा जातीय विद्वेष को उभारा गया। एक जाति को देश छोड़ने की तो दूसरी जाति को विनष्ट करने की धमकी भरी वाणी सोशल मीडिया में तैरने लगी। सोशल मीडिया पर भेजे जा रहे तथाकथित विद्वत्तापूर्ण पोस्ट भी भय और घृणा को वैचारिक आधार प्रदान कर रहे थे।


            शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और पेपर लीक की अति ने युवाओं की आंखों के सपने छीन लिए। ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी का उभार और संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा ने दिलोदिमाग में छुपी हुई भड़ास को बाहर निकलने का मौका दे दिया।अवसाद और आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं ने चारों तरफ फैलाई गई भय और घृणा के पेट्रोल में चिंगारी लगा दी। यह आग लगनी थी और इसमें देश को झुलसना था-


'अजब लोग हैं रहम आता है इन पर


जो कांटे बो कर जमीं से गुलाब मांगते हैं


गुनहगार तो नजरें हैं आपकी वरना


कहां ये फूल से चेहरे नकाब मांगते हैं।'


              यह भारत की मूल अहिंसात्मक वृत्ति का कमाल है कि यह आग सिर्फ वाणी की ज्वाला के रूप में प्रकट हुई है। अफसोस इतना है कि वाणी की यह ज्वाला संस्कृति तो छोड़ ही दी,प्रकृति को भी छोड़कर विकृति की हद तक चली गई।


                'सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात्' वाला सनातनी उपदेश और सनातनी संस्कार काम नहीं आया। क्योंकि प्रकृति ने पेट से ऊपर हृदय और मस्तिष्क बनाया है। चरम बेरोजगारी ने पापी पेट का सवाल पैदा कर दिया। हमारे ऋषि कहते हैं-'बुभुक्षितं किं न करोति पापम्'अर्थात् भूखा कौन सा पाप नहीं करता।


                   ऐसी स्थिति में सरकार की जितनी बड़ी भूमिका है,उससे भी बड़ी भूमिका शिक्षा की है। सरकार को तो उत्तरदायित्व निभाना ही होगा क्योंकि पापी पेट के सवाल को हल वही कर सकती है ; लेकिन हृदय को सुसंस्कृत और मस्तिष्क को परिष्कृत शिक्षा ही कर सकती है।


हर व्यक्ति के अंदर आत्मा है और उस आत्मा का विकास अभय के वातावरण में होता है। भय के वातावरण ने उस आत्मा को कुचलने का प्रयास किया। अभय का वातावरण उस आत्मा को यदि विकसित होने का मौका देता है तो हृदय सुसंस्कृत भी होगा और मस्तिष्क परिष्कृत भी होगा। जो भी हृदय में भाव की क्षुद्रताएं थीं और मस्तिष्क में विचारों की आक्रामकता थी, वे एक बार अत्यंत विकृत रूप में निकल गईं-


'पतन बहुत आसान मगर उत्थान कठिन है


ध्वंस बहुत ही सहज मगर निर्माण कठिन है


समता और विषमता के कोलाहल में


अपने और पराए की पहचान कठिन है।'


           संवेदनशीलता और संवादशीलता के अतिरिक्त अन्य उपाय से इस तूफान को शांत नहीं किया जा सकता। क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया का वातावरण चला तो वाणी की ज्वाला भड़ककर दूसरा रूप ले सकती है। भारत ('भा'-ज्ञान, 'रत'-लीन) जो ज्ञान में लीन होने के कारण विश्वगुरु बना था,आज एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है क्योंकि शिक्षा


व्यवस्था की दुर्दशा के कारण अज्ञान में लीन हो गया है-


'जो बांटता फिरता था दुनिया को उजाले


उसके दामन में आज अंधेरे ही अंधेरे हैं।'


               इन अंधेरों से प्रकाश की ओर ज्ञान के संवाहक ही ले जा सकते हैं। गाली तो एक तात्कालिक हताश-निराश प्रतिक्रिया है,मूल प्रश्न शिक्षा व्यवस्था में सुधार का है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹