🙏राम मंदिर में दान की चोरी से कुछ व्यक्ति और संगठन सवालों के घेरे में आ गए हैं। विचारणीय बात यह है कि दोषी व्यक्ति को माना जाए या संगठन को?-एक दृष्टि🔥


संवाद


"दोषी कौन: व्यक्ति या संगठन"


श्री राम मंदिर में दान की चोरी से व्यक्तियों के साथ संघ,संगठन और पार्टी पर सवाल उठने लगे हैं। दोषारोपण का खेल राजनीति करती है किंतु सत्यान्वेषण का कार्य शिक्षा का है। भारतीय संस्कृति के रग रग में राम समाहित है। मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में ही जब मर्यादा का उल्लंघन हो रहा है तो इसका दोषी कौन है, यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।


              इस संदर्भ में भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा व्यक्ति में होती है,किसी संघ,संगठन या पार्टी में नहीं। जहां आत्मा है, वहां उत्तरदायित्व होता है; क्योंकि


'टोक देता है कदम जब भी गलत उठता है


ऐसा लगता है कि कोई मुझसे बड़ा है मुझमें


अब तो ले दे के वही शख्स बचा है मुझमें


मुझको मुझसे जुदा करके जो छुपा है मुझमें।'


         अंतरात्मा की आवाज के कारण डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि बन गए।कथा कहती है कि रत्नाकर परिवार चलाने के लिए चोरी और लूट का काम करता था किंतु नारद ने कहा कि तुम यह काम जिसके लिए कर रहे हो, क्या वे लोग भी तुम्हारे इस पाप कर्म का भागी बनेंगे? जब रत्नाकर ने अपने परिजनों से पूछा तो उन्होंने  इनकार कर दिया। परिजनों ने कहा कि घर चलाना तुम्हारी जिम्मेवारी है। तुम घर चलाने के लिए धनार्जन सही मार्ग से कर रहे हो या गलत मार्ग से कर रहे हो, यह तुम जानो। तुम्हारे पाप का भागी हम क्यों बनें? उस रत्नाकर की आत्मा जग गई और मरा मरा जपता हुआ रत्नाकर राम राम जपने लगा। फिर वे महर्षि वाल्मीकि कहलाए जिन्होंने रामायण रचकर जगत को मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जीवन मंत्र दिया।


            जिस संघ,संगठन या पार्टी में आत्मवान व्यक्ति होते हैं, वे मर्यादा और मूल्यों की रक्षा करते हैं जिसके कारण संघ,संगठन या पार्टी जनता के लिए अनुकरणीय बन जाती है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में कांग्रेस से गांधी,नेहरू,सुभाष,पटेल जैसी अनेक महान आत्माएं जुड़ीं जिसके कारण यह संगठन भारत की आवाज बन गया। इसी प्रकार से भारतीय जनता पार्टी अटल,आडवाणी,जोशी जैसी महान आत्माओं के मूल्यों के कारण 'पार्टी विद् डिफरेंस' कहलाई और राम मंदिर निर्माण के कारण इसकी लोकप्रियता आसमान छू गई। जिन मूल्यों के कारण कोई संगठन लोकप्रिय होता है, उन मूल्यों को छोड़ने से वह संगठन बदनाम भी हो जाता है क्योंकि संगठन की शक्ति मूल्यों में बसती है सिर्फ संख्या में नहीं।


                 आमजन को प्रेरणा महान आत्मा से मिलती है और वे जिस संघ,संगठन या पार्टी में होते हैं, उनसे आमजन जुड़ जाते हैं। बौद्ध धर्म में त्रिरत्न हैं- बुद्ध,धम्म और संघ। इनका क्रम बहुत महत्वपूर्ण है-बुद्धं शरणं गच्छामि,धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि।


'बुद्धं शरणं गच्छामि' बौद्ध धर्म के त्रिरत्न में सबसे पहले है। बुद्ध अर्थात् जागा हुआ व्यक्ति या आत्मवान व्यक्ति की शरण में हम जाते हैं। इसके बाद आता है 'धम्मं शरणं गच्छामि' ,जिसका अर्थ है बुद्ध के द्वारा जिस धर्म को बताया गया उसकी शरण में हम जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो महाजनो येन गत: स: पंथा:।अंत में 'संघं शरणं गच्छामि'आता है।इसका अर्थ है कि जहां पर अनेक लोग बुद्धत्व को प्राप्त करने के लिए इकट्ठे हुए हैं ,उनकी शरण में हम जाते हैं।


             आज राम नहीं है किंतु राम की मर्यादाओं और मूल्यों को  पालन करने वाले लोग हैं। ऐसे लोगों का संघ,संगठन या पार्टी भी है। यदि संघ,संगठन या पार्टी सवालों के घेरे में आ जाते हैं तो हमें आत्मवान व्यक्ति की खोज करनी चाहिए क्योंकि वे कहीं भी और  किसी भी संघ,संगठन या पार्टी में मिल सकते हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹