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🙏दिमागी नक्सल का आखिर यथार्थ क्या है?-एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण🔥


संवाद


'दिमागी नक्सल का यथार्थ'


'दिमागी नक्सल' शब्द पर पक्ष और विपक्ष में तलवारें खिंच गई हैं। शिक्षा जगत का यह दायित्व है कि किसी भी शब्द पर ऐसी सार्थक समझ विकसित करे जो राष्ट्रहित में हो। ऐसे में मानव व्यक्तित्व में 'दिमाग' का महत्व और 'नक्सल' शब्द का अर्थ समझना बहुत जरूरी है।


            सभी जीवों में दिमाग के विकास के कारण मानव सर्वश्रेष्ठ जीव बन गया। जिस दिमाग ने पदार्थ पर काम करके विज्ञान के द्वारा एटम शक्ति हासिल कर लिया, उसी दिमाग ने गांधी की अहिंसक विचारधारा से लेकर माओ की हिंसक विचारधारा तक को जन्म दिया। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में माओ की विचारधारा के आधार पर सत्ता पर कब्जा करने के लिए एक सशस्त्र क्रांति का शंखनाद हुआ। यह नक्सलवाद अपनी हिंसक प्रवृत्ति के कारण विकास का विरोधी साबित हुआ जिस पर बहुत मुश्किल से सराहनीय नियंत्रण कायम करने में वर्तमान सरकार को सफलता मिली।


             आज सशस्त्र क्रांति को आगे बढ़ाने वाला नक्सलवाद तो कमजोर पड़ गया है किंतु शिक्षा में क्रांति को लेकर एक नया वाद वर्तमान में चुनौती बन गया है। शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर यह नया वाद जो उभरा है वह उग्र और आक्रामक है। इसमें व्यवस्था के प्रति विद्रोह की एक झलक मिल रही है। मूल प्रश्न यह है कि क्या इस नई वैचारिक क्रांति को 'दिमागी नक्सल' कहकर उसे सख्ती से दबा दिया जाना चाहिए अथवा उसके साथ संवाद करके व्यवस्थागत कमियों में सुधार करना चाहिए?


               जेन जी और अल्फा जेन द्वारा जो प्रश्न उठाए जा रहे हैं,उन प्रश्नों के ऊपर और प्रश्नों के उठाने के तरीकों के ऊपर अवश्य विचार होना चाहिए। कभी प्रश्न गलत हो सकते हैं तो कभी प्रश्न के उठाने के तरीके गलत हो सकते हैं ; किंतु दिमाग से उठाए गए प्रश्नों को हमारी संस्कृति ने बहुत महत्व दिया है। कठोपनिषद में 7 साल का नचिकेता जब अपने 70 साल के बाप के सामने में प्रश्न उठाता है तो पिता द्वारा उसे मृत्यु को दिए जाने की बात कही जाती है। नचिकेता अपने पिता से यह पूछ रहा था कि आप एक तरफ मुझे यह सिखाते हैं कि दान में सबसे प्रिय वस्तु देनी चाहिए किंतु दूसरी तरफ आप दान में बूढ़ी और दूध नहीं देने वाली गायों का दान कर रहे हैं,ऐसा क्यों? आपके लिए सबसे प्रिय आपका पुत्र मैं हूं,इसलिए आप मुझे दान में किसे देंगे यह बता दीजिए? पिता ने क्रुद्ध होकर कहा-मैं तुझे मृत्यु को दान देता हूं।


           600 ई.पू. में ब्राह्मणवाद के अनावश्यक कर्मकांड के विरुद्ध महावीर और गौतम बुद्ध ने प्रश्न उठाए जिसके कारण जैन धर्म और बौद्ध धर्म का जन्म हुआ। इसने धर्म को वैज्ञानिक आधार देने का प्रयास किया। ब्राह्मण संस्कृति के विरोधस्वरूप जन्मी श्रमण संस्कृति अधिक लोकप्रिय हो गई।ब्राह्मण संस्कृति विश्वास करती थी कि कोई भगवान अवतार लेकर जगत को ठीक करता है। इसके विरुद्ध श्रमण संस्कृति का मानना था कि इंसान ही अपने अच्छे कर्मों से भगवान बन सकता है, अलग से भगवान को मानने की कोई जरूरत नहीं। ब्राह्मणों के अवतारवाद और श्रमणों के पुरुषार्थवाद की धारणा में संघर्ष बना रहा और इसने हिंसक रूप भी लिया जिसके कारण भारत से बौद्ध धर्म लुप्त हो गया और जैन धर्म अत्यंत सीमित वर्ग में बचा रहा।


                आज का भी संघर्ष यही है। राम जन्मभूमि और कृष्ण जन्मभूमि आंदोलन के पीछे अपनी परंपरा को ज्यादा महत्व देने की और आस्तिकता को प्रमुख मानने की सोच काम कर रही है। यह दक्षिणपंथी सोच है।दूसरी सोच यह है कि परंपरागत रास्ते के देवालय से विद्यालय पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि इंसान को भगवान बनाने का यज्ञ वहीं पर चलता है। जब परलोक पर ज्यादा ध्यान जाता है तो इहलोक गड़बड़ाने लगता है। यह वामपंथी सोच है।


               दक्षिणपंथ और वामपंथ का संघर्ष सदियों से चला आ रहा है। जीवन और जगत में दोनों प्रवृत्तियां विद्यमान हैं। दोनों के पक्ष में तर्क भी हैं और समर्थक लोग भी हैं। चुनौती तो अतिवाद से उत्पन्न होती है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी ने अद्भुत संतुलन दोनों के बीच स्थापित किया और स्वतंत्रता संग्राम से सभी को जोड़ दिया। अतिवादी मुस्लिम संगठन के विरुद्ध अतिवादी हिंदू संगठन के खड़ा होने से देश की एकता खतरे में पड़ रही थी। ऐसे में एक तरफ 'रघुपति राघव राजा राम' कहने वाले गांधी 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' भी कहते थे और दूसरी तरफ आस्तिक गांधी ने नास्तिक समझे जाने वाले नेहरू को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित किया, जिन्होंने वैज्ञानिक-औद्योगिक संस्थानों तथा बड़े बांधों को भारत का आधुनिक मंदिर कहा।


             सामाजिक अन्याय पर प्रश्न उठाना,सरकार की नीति की आलोचना करना और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार सभी को संविधान देता है,अतः यह नक्सलवाद नहीं है। अतः विपक्षी नेताओं और नागरिक संगठनों ने 'दिमागी नक्सल' शब्द पर गहरा एतराज जताया है। इसको असहमति को कुचलने वाला प्रयास बताया है। इसके विपरीत सरकार का तर्क है कि राष्ट्र की एकता और संप्रभुता को खतरे में डालने वाले विचारों के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।


             जिस प्रकार से युवाओं का आंदोलन बढ़ता जा रहा है और भाषिक तथा वैचारिक रूप से उग्र होता जा रहा है,उस प्रकार से उसके हिंसक होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। जब तक शिक्षाविद् सोनम वांगचुक का प्रभाव और मार्गदर्शन दिल्ली के जंतर मंतर के आंदोलन में रहा तब तक आंदोलन शांतिपूर्ण और शालीन बना रहा किंतु जब उन्हें आंदोलन स्थल से उठा लिया गया तो यह आंदोलन आक्रामक और अमर्यादित भी हो गया।


              ऐसे में सत्य,प्रेम,अहिंसा का गांधी मार्ग ही असंतोष की ज्वाला को रोशनी में तब्दील कर सकती है। लेकिन गांधी जैसा आत्मावलोकन करने वाला और धैर्य तथा साहस रखने वाला नेतृत्व सर्वत्र उपलब्ध नहीं हो सकता। इसलिए खतरा है कि जो असंतोष अत्यंत उग्र रूप में और गाली के रूप में प्रकट हो रहा है, वह कभी भी संगठित होकर ज्यादा प्रतिक्रियात्मक होने से हिंसक रूप ले सकता है।


               इसमें समाधान का रास्ता राजनीतिक से ज्यादा शैक्षिक और आध्यात्मिक है। जिस शिक्षा के कारण युवा अवसाद में जा रहे हैं और आत्महत्या तक कर रहे हैं, उस शिक्षा व्यवस्था के विरुद्ध यदि भाषा आक्रामक और अमर्यादित हो गई हैं तो सरकारों को और सभी क्षेत्र के बड़ों को इसके प्रति संवेदनशीलता दिखानी होगी। संवेदनशीलता दिखाने का पहला रास्ता संवादशीलता है। जानने का यह प्रयास होना चाहिए कि युवा वर्ग इतना आक्रामक और अमर्यादित क्यों हो रहा है? जिस शिक्षा व्यवस्था रूपी वृक्ष पर ऐसे फल लगे हैं,क्या उस शिक्षाव्यवस्थारूपी वृक्ष पर विचार नहीं होना चाहिए?


         जिस भारतीय संस्कृति के अध्यात्म प्रधान दर्शन में चार्वाक दर्शन को सबसे पहले पढ़ाया जाता है और नास्तिक बौद्ध दर्शन और जैन दर्शन को भी आस्तिक -षड्दर्शनों के साथ समुचित स्थान दिया जाता है, उस भारतीय संस्कृति की सरकार को विविधता में एकता का सूत्र ढूंढने आना चाहिए‌। विचार को विचार के द्वारा काटा जाना चाहिए-'वादे वादे जायते तत्वबोध:'। वाद-विवाद से संवाद तक पहुंचाने वाली शिक्षा-व्यवस्था का पुनर्निर्माण होना चाहिए।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹