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🙏संस्कृत सप्ताह की शुभकामना:भले ही भारतीय संस्कृति संस्कृत पर आश्रित हो किंतु संस्कृत भाषा की आज उपेक्षा हो रही है क्योंकि दर्शन-प्रधान-संस्कृत प्रदर्शन-प्रधान-युग में आकर्षित नहीं करती-एक दृष्टि(१)🙏


संवाद


  'दर्शन प्रधान संस्कृत भाषा'


        संस्कृत सप्ताह मनाने का सरकारी आदेश शिक्षा- संस्थानों को मिला है। कॉलेज में एडमिशन के समय विद्यार्थी भाषा के रूप में अंग्रेजी चुनना ज्यादा पसंद करते हैं, संस्कृत नहीं।एक प्रश्न मन में उठने लगा कि भारतीय संस्कृति की आधारभूत भाषा संस्कृत की लोकप्रियता क्यों घटने लगी? इसके अनेक कारण हैं किंतु एक महत्वपूर्ण कारण जिसकी ओर सबका ध्यान नहीं जाता है, वह है प्रदर्शन के युग में दर्शन की बात करने वाली संस्कृत के अनुकूल माहौल नहीं है।


            भारतीय संस्कृति का सबसे पहला विषय दर्शन था। दर्शन की जितनी गहरी और व्यापक अभिव्यक्ति संस्कृत भाषा में मिलती है, उतनी अन्य भाषा में नहीं। आज भारत में किसी भी विषय में डॉक्टरेट की जो उपाधि दी जाती है उसे पीएच.डी.(Ph.D) कहा जाता है जिसका अर्थ है- डॉक्टरेट इन फिलासफी। इसका मतलब है कि विषय कोई भी हो किंतु उसमें गहरे शोध को फिलासफी कहा जाता है। फिलॉसफी से भी ज्यादा गहरे में 'दर्शन' शब्द जाता है। इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। फिलासफी विचार पर जोर देता है जबकि दर्शन देखने पर या अनुभूति पर। कबीर कहते हैं-


'लिखा-लिखि की है नहीं, देखा-देखी बात


दूल्हा-दुल्हन मिल गए, फीकी पड़ी बरात।'


             आज हमारे देश में प्रदर्शन और प्रचार पर सरकारें जितना पैसा खर्च कर रही हैं और सामान्य जन भी प्रदर्शन और प्रचार के प्रति जितना उत्सुक दिख रहे हैं, वे सब हमारे भारतीय संस्कृति के दर्शन के विपरीत हैं। दर्शन से ज्यादा प्रदर्शन पर जोर देने के कारण विश्वगुरु का डंका बजाने वाले भारत की शिक्षा और परीक्षा सबसे दयनीय स्थिति में पहुंच चुकी है। 'सा विद्या या विमुक्तये' की बात करने वाली शिक्षा जीवन निगलने लगी क्योंकि दर्शन को हमने पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया है। स्कूलों में तो दर्शन विषय है ही नहीं और कॉलेजों में भी विलुप्ति के कगार पर है‌।


              जीवन का दर्शन बिगड़ जाए तो सब कुछ बिगड़ जाता है।जीवन जब सिर्फ प्रदर्शन हो जाता है तो जड़ मूल से कट जाता है। किसी मूल पर खिले हुए फूल की सुगंध उसमें नहीं होती। प्लास्टिक के फूल के समान वैसे जीवन में बाहरी चमक दमक तो दिखाई देती हैं किंतु आंतरिक रंग और रस नहीं मिलता।


               जो दर्शन पेड़-पौधों से लेकर जीव-जंतुओं तक में उसी एक आत्मा की झलक पाता था,वो दर्शन मानवों में पंडित उसी को मानता था जो सारे प्राणियों में उसी आत्मा को देखता था- 'आत्मवत् सर्वभूतेषु य:पश्यति स पंडित:'। सभी प्राणियों में आत्मा को देखने वाला पंडित आज नहीं रहा।प्रदर्शन वाले युग में पंडित या विशेषज्ञ वह है जो मानव को जाति या धर्म के आधार पर बांटता है-


'दिखाई दे न कभी यह तो मुमकिनात में है


वो सब वजूद में है जो तस्सवुरात में है


नजर के जाविये बदले हैं और कुछ भी नहीं


वही है काबे में  जो नूर सोमनात में है।'


शायर का भाव यह है कि नूर (प्रकाश) काबा का अलग और सोमनाथ का अलग नहीं है। दृष्टिकोण बदलने से एक ही नूर सब में दिखाई देने लगता है-


'सब में तेरा नूर समाया, कौन है अपना कौन पराया'


           'वंदे मातरम्' पर चल रहा वाद विवाद दर्शन को समझने में सबसे ज्यादा सहयोगी है। वंदे मातरम् गीत का दर्शन कहता है कि जलाशयों को स्वच्छ रखो-'सुजलाम्', हरे-भरे फलदार वृक्षों को बचाए रखो-'सुफलाम्' , हवा को शीतल और सुगंधित बनाए रखो-'मलयज शीतलाम्',


खेतों को अनाजों से लहलहाए रखो- 'शस्य श्यामलाम् ; लेकिन प्रदर्शनवादी सिर्फ 'वंदे मातरम्' गीत गाकर भारत माता के प्रति अपने प्रेम का ढिंढोरा पीटना चाहते हैं। अन्यथा गंगा मैली नहीं होती,पेड़ काटकर हाईवे नहीं बनाए जाते, हवा प्रदूषित नहीं होती और किसान आत्महत्या को मजबूर नहीं होते। क्योंकि बंकिम बाबू की नजर में-


सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,


शस्यश्यामलाम् मातरम्!


वंदे मातरम्!


                दर्शन विषय को संस्कृत प्रेमियों ने सबसे ज्यादा इसीलिए महत्व दिया था कि गहरे में देखने पर सभी में एक ही तत्व दिखाई दिया और सभी का गंतव्य एक ही दिखाई दिया जिस प्रकार से सारी नदियां एक ही सागर में मिल जाती हैं। भेद सिर्फ ऊपरी है, गहरे में अभेद छिपा हुआ है जिसे संस्कृत भाषा में अद्वैत दर्शन कहा गया।


           अद्वैत दर्शन को मानने पर राजनीति नहीं चल सकती क्योंकि राजनीति का मूल मंत्र है-'बांटो और राज करो'। बांटने वाले व्यापार प्रधान प्रदर्शन के युग में दर्शन प्रधान संस्कृत कोई क्यूं कर पढ़े? कोहिनूर को पहचानने के लिए जौहरी भी तो चाहिए अन्यथा वह कोयले के बीच में अन्य पत्थरों के समान सामान्य पत्थर बनकर पड़ा रहता है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹