खेलों का वैभव
August 27, 2026🙏खेलो इंडिया संवाद का आज आयोजन है।ऐसे में 'खेल के महत्व' और 'भारत में खेलों की वास्तविक स्थिति' को समझना जरूरी है-एक अनुभवजनित दृष्टि🔥
संवाद
"खेलों का वैभव"
खेल दिवस पर जब ध्यान 'खेल के महत्व' और 'भारत में खेलों की वास्तविक स्थिति' पर एक साथ जाता है तो असमंजस बढ़ जाता है। खेल का महत्व समझना हो तो स्वामी विवेकानंद का एक वाक्य ध्यान में रखना चाहिए कि तुम गीता पढ़ने की अपेक्षा फुटबॉल के द्वारा स्वर्ग के अधिक समीप पहुंच सकोगे। संदेश यह है कि खेल शरीर को मजबूत बनाता है और बिना मजबूत शरीर के धर्म की साधना नहीं हो सकती-'शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्'. राष्ट्रकवि दिनकर कहते हैं कि-
'पत्थर सी हो मांसपेशियां लोहे से भुजदंड अभय
नस-नस में हो लहर आग की तभी जवानी पाती जय।'
भारत में खेलों की वास्तविक स्थिति को जानना हो तो हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जीवन के अंतिम समय को ध्यान में रखना चाहिए जब उनका घर पैसों के अभाव से जूझ रहा था और उन्होंने विश्वप्रसिद्धि पाने के बावजूद कैंसर से लड़ते हुए अस्पताल के जनरल वार्ड में दम तोड़ दिया। हॉकी की जगह वे यदि क्रिकेट के जादूगर होते तो इतनी सफलता और प्रसिद्धि के बाद अकूत संपदा के मालिक होते और भारत रत्न कहलाते।
मेरे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा खेल के मैदान में बीता और बहुत प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के खेल जीवन को उचित खेल संरचना के अभाव में दम तोड़ते देखा। खेल संघों पर राजनीतिज्ञों का कब्जा और प्रशासनिक अधिकारियों का हस्तक्षेप इस कदर हावी है कि खिलाड़ी की प्रतिभा का फूल खिलता ही नहीं।
मेरे क्रिकेट के गॉडफादर ने मुझे यही गुरु मंत्र दिया था कि कितना भी अच्छा खेलो लेकिन भारत में नौकरी के लिए तो पढ़ना ही पड़ेगा। क्रिकेट के बदौलत छोटी नौकरी भी तब लगेगी जब तुम इंडिया खेल जाओगे। इस गुरु मंत्र ने मुझे खेल के साथ पढ़ने की भी प्रेरणा दी, जब क्रिकेट छूटा तो पढ़ाई के क्षेत्र में मुझे आगे कदम बढ़ाने की ताकत दी और मैं जीवन जीने का दूसरा सहारा पा सका। कई मेरे साथी खिलाड़ी क्रिकेट में स्टार के रूप में चमके और फिर अंधेरे में विलीन हो गए। क्रिकेट में जितना समय उन्होंने लगाया था और जितनी प्रतिभा विकसित की थी,उसके अनुरूप उन्हें कुछ नहीं मिला। कुछ मेरे क्रिकेट साथी जरूर ऊंचाई पर पहुंचे किंतु उपवन में एक या दो फूल खिलते हों तो इसे उपवन का मधुमास नहीं माना जाएगा-
'एक फूल का खिल जाना ही उपवन का मधुमास नहीं है
बाहर घर का जगमग करना भीतर का उल्लास नहीं है।'
हमारे समाज में खेल के प्रति मानसिकता यह रही है कि-'खेलोगे कूदोगे होओगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब'. क्रिकेट जैसे खेलों की चमक दमक ने इस कहावत को झूठलाने का प्रयास किया है किंतु अधिकांश खेलों की वास्तविक स्थिति को यदि हम देखेंगे तो भारत में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन उनको तराशने के लिए समुचित संसाधन और सुविधा नहीं है।
आज तो शिक्षा की दुर्दशा देखकर 'पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब' वाला विचार भी बदलता जा रहा है। साधनों और शिक्षकों का अभाव देखकर और प्रतिभाओं के अवसाद और आत्महत्या को सुनकर शिक्षा जैसा अनिवार्य क्षेत्र भी जब प्रश्नों के घेरे में आ गया तो खेल जैसा गैर अनिवार्य क्षेत्र की तो बात ही क्या कहना!
खेल दिवस पर हम यह जरूर सोचें कि जिस ध्यान चंद ने भारत को गौरव दिलवाया, उस ध्यानचंद को सरकारों ने क्या दिया। जिस भारतीय टीम को ध्यानचंद ने साधनों के अभाव के बावजूद ओलंपिक पदक विजेता बनाया था, वही भारतीय टीम ध्यानचंद के जिंदा रहते हुए अंतिम समय में उनकी सलाह नहीं मानने के कारण ओलंपिक से निराश लौटने लगी।
भारत की मूल समस्या यह है कि एक खिलाड़ी के हाथ में खेल विभाग नहीं है और एक शिक्षाविद् के अनुसार शिक्षा विभाग का काम नहीं हो रहा है। ऐसे में आंकड़ों की बाजीगरी करके राजनीतिक लाभ तो प्राप्त किया जा सकता है किंतु प्रतिभा का विकास नहीं। शिक्षा के कारण जो भारत कभी विश्वगुरु बना था उस भारत में शिक्षकों का अभाव और शिक्षा पर आवंटित बजट देखकर कोई भी कह सकता है कि शिक्षा हमारी प्राथमिकता में नहीं है। इसी तरह खेल प्रशिक्षकों का अभाव और खेल सुविधाओं को देखकर क्या हम अंदाज नहीं लगा सकते हैं कि भारत में खेलों की वास्तविक स्थिति क्या है?
इसके बावजूद भी खेल के प्रति मेरे दिल में प्यार है क्योंकि खेल ने मुझे हार जीत से ऊपर उठकर खेल का आनंद लेने की कला सिखाई। पढ़ाई में जो एकाग्रता मुझमें आई और जो संघर्ष का माद्दा मेरे जीवन में आया, वह मुझे खेल के मैदान से मिला। आज भी मैं उस खेल मैदान में सर झुकाने सुबह शाम जाता हूं और उन खिलाड़ियों के प्रति अत्यंत आदर से भर जाता हूं जिनको खेल ने नौकरी भी नहीं दी, फिर भी वे निःस्वार्थ भाव से खेल की दीवानगी के कारण नई पीढ़ी को अपना प्रशिक्षण दे
रहे हैं। ऐसी खेल परिस्थितियों में भी एक क्रिकेट स्टार वैभव सूर्यवंशी निकलता है तो वह सबकी निगाहों में आ जाता है लेकिन उसी समय मेरी निगाह में भारत के कई वैभव तैरने लगते हैं जिन्हें यदि क्रिकेट के खेल के समान ही लोकप्रियता,सुविधा और संरक्षण मिलता तो वे सभी अपने-अपने क्षेत्र में भारत को गौरव दिलाते।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹