🙏रक्षाबंधन की शुभकामना🙏


रक्षाबंधन के पर्व को भाई बहन के पारंपरिक रूप से निकालकर एक नया रूप देना होगा। भाई हो या बहन; शिक्षा सभी को रक्षा की शक्ति देती है। आज शिक्षा की रक्षा के बंधन को स्वीकारने की आवश्यकता है क्योंकि 'शिक्षा रक्षति रक्षित:'-एक दृष्टि🔥


संवाद


"रक्षा किसकी और किससे?"


बंधन से हर कोई मुक्ति की कामना करता है किंतु रक्षाबंधन ऐसा पर्व है जिसमें बंधन की रक्षा का वचन दिया जाता है।रक्षाबंधन का पर्व कभी पत्नी की पति द्वारा रक्षा में अपना अर्थ ढूंढता था, कभी प्रजा की राजा द्वारा रक्षा के संबंध में, कभी पुरोहित की यजमान द्वारा रक्षा के संबंध में और कभी एक रानी की दूसरे राजा द्वारा रक्षा के संबंध में।


             मूल भाव यह है कि कुछ बंधन इतना प्यारा होता है कि उसकी भी रक्षा के लिए मन संकल्प करने लगता है। काठ के बक्से को छेदकर बाहर निकल जाने वाला भंवरा फूल की कोमल पंखुड़ियों के बंधन में रात भर बंद रहता है-


'बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्।


दारुभेदनिपुणोऽपि षडङ्घ्रिर्निष्क्रियो भवति पङ्कजकोशेः।'


             निहितार्थ यह है कि यदि बंधन प्रेम का हो तो हर कोई उस बंधन की भी रक्षा करना चाहता है ; रक्षाबंधन का यही अभिप्राय है। इस संदर्भ में हमारा अनुभव कहता है कि नई पीढ़ी से पुरानी पीढ़ी का संबंध प्रेम का होता है। यही कारण है कि सर्वत्र विजय की इच्छा करने वाला नर पुत्र और शिष्य से पराजय की कामना करता है-


'नर: सर्वत्र विजयमिच्छेत् पुत्रात् शिष्यात् च पराजयम्।'


             आज शिक्षा की दुर्दशा के कारण नई पीढ़ी गहरे खतरे में है और परीक्षा की दशा तो इतनी दयनीय हो गई है कि नई पीढ़ी आत्महत्या को मजबूर है। मुक्तिदायिनी शिक्षा विनाशकारिणी बना दी गई और प्रतिभा को पहचानने के लिए आयोजित होने वाली परीक्षा प्रतिभा का संहार करने वाली हो गई। शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए जायज मांग करने वालों पर भी प्रश्न उठाया जा रहा है। शिक्षा और परीक्षा की रक्षा के बंधन को हमें पर्व का रूप देना होगा। यदि शिक्षा सिर्फ अमीरों का एकाधिकार हो जाएगी तो झोपड़ी में जन्म लेने वाली प्रतिभाओं को भारत कैसे संवार पाएगा?-


'कुसुम मात्र खिलते नहीं राजाओं के उपवन में


अमित बार मिलते वे पुर से दूर कुंज कानन में


कौन जाने रहस्य प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल


गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।'


              कभी इंद्राणी द्वारा इंद्र को राखी बांधी गई , कभी लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को और कभी रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को राखी भेजी गई ताकि रक्षा मिल सके। आज जरूरत है कि नई पीढ़ी अपनी पुरानी पीढ़ी को राखी बांधे और उस रक्षा सूत्र की याद दिलवाए जो जन्म देने के साथ अच्छा जीवन देने का बंधन भी स्वीकार करता है।


नई पीढ़ी को न तो शिक्षा का अच्छा मंत्र दिया गया और न परीक्षा का अच्छा तंत्र दिया गया। परिणाम हमारे सामने है कि बेरोजगारी ने विकराल रूप धारण कर लिया और युवा जान तक देने लगे।उनके मुख से गालियां निकल रही हैं। गालियों से हम आहत हो जा रहे हैं किंतु उनकी आत्महत्या से हम आहत नहीं हो रहे हैं तो इसका मतलब है कि पुरानी पीढ़ी के दिल में नई पीढ़ी के प्रति प्रेम नहीं है।


           रक्षाबंधन प्रेम का पर्व है और उस प्रेम की रक्षा हम सभी को हर कीमत पर करनी चाहिए। शिक्षा के द्वारा ही वह योग्यता और सामर्थ्य मिलती है कि हम किसी की रक्षा कर सकते हैं।इस प्रेम के बंधन की रक्षा के लिए रक्षाबंधन का यह पर्व नए संकल्प की मांग कर रहा है। शिक्षा की रक्षा के बंधन के लिए हम सभी को संकल्पित होना होगा।भाई हो या बहन; सभी को स्वयं और दूसरे की रक्षा के लिए शिक्षा योग्य बना देती है-'शिक्षा रक्षति रक्षित:'.


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹