प्रकृति के अनुसार जियो
August 31, 2026/start
🙏नेपाल त्रासदी:मृतात्माओं के प्रति श्रद्धांजलि😭
प्राकृतिक आपदाएं संदेश दे रही हैं कि प्रकृति से लड़ो मत बल्कि उसके साथ जियो-एक विश्लेषण🔥
संवाद
"प्रकृति के अनुसार जियो"
हिमालय की गोद में बसे हुए नेपाल में जो प्रकृति की विनाश लीला हुई उसे पौराणिक और वैज्ञानिक दोनों ढंग से देखा जाना चाहिए। पौराणिक कहानियां सामान्य जन को वही सत्य सरल ढंग से समझाने का प्रयास करती हैं जिसे वैज्ञानिक ढंग से समझाने पर विशेष जन ही समझ पाते हैं।
तथाकथित विकास के नाम पर आधुनिक मानव जो काम कर रहा है वह दानव ही कर सकता है कि अपनी धरती मां के अंगों को क्षत-विक्षत कर दे। पुराणों में हिमालय की पुत्री का नाम पार्वती हैं अर्थात् पर्वत की पुत्री; जिनका विवाह शिव के साथ हुआ था। भारतीय ऋषियों ने हिमालय को बेजान पहाड़ नहीं जिंदा इंसान माना था। विज्ञान भी इस बात से सहमत है कि हिमालय आज भी बढ़ रहा है। पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। शिव चेतना और संयम के प्रतीक हैं जबकि पार्वती प्रकृति और शक्ति की। भारतीय दर्शन कहता है कि चेतना और प्रकृति के बीच सामंजस्य होना चाहिए। जब मनुष्य की बुद्धि प्रकृति की शक्ति को समझकर साहचर्य भाव से चलती है तब सृजन होता है लेकिन जब बुद्धि अहंकार में बदलकर विजय करने के भाव से चलती है तो विनाश होता है।
शिव को प्राप्त करने के लिए 'तप' करना पड़ता है किंतु जब तप छोड़कर केंद्रीय मूल्य 'उपभोग' हो जाता है तो अशिव(अमंगल) घटित होने लगता है। एक तरफ जनसंख्या का बढ़ना और दूसरी तरफ उपभोक्तावादी प्रवृति का बढ़ना प्राकृतिक संकट को कई गुना बढ़ा देता है। बढ़ी हुई जनसंख्या की अनंत वासनाओं को पूरा करने के लिए विज्ञान ने प्रकृति पर जीत का सपना देखना शुरू किया। पहाड़ों को काटकर रास्ते बना दिए गए,नदियों के मार्ग में बांध बनाकर कई प्रकार के प्रोजेक्ट शुरू कर दिए गये, जंगलों को काटकर बस्तियां बसा दी गईं, धरती के बाद आकाश को भी प्रदूषित करने के लिए कई प्रकार के अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिए गए।
धरती को मां मानने वाले और आकाश को पिता कहने वाले दर्शन को भुला दिया गया। मां तो अपने बच्चों को प्रेमवश स्तनपान कराती है और पिता उनके लिए अपना सर्वस्व न्योच्छावर कर देता है। बच्चा जब अपने अज्ञान में मां का खून पीने लगता है और पिता को जख्मी करने लगता है तो वही प्रकृति नेपाल की त्रासदी के रूप में हमारे सामने में प्रकट होती है।
गांधी कहा करते थे कि आवश्यकताएं पूरी करने के लिए प्रकृति के पास पर्याप्त है किंतु लोभ को पूरा करने के लिए नहीं। पर्यावरणविद् कहते हैं कि लोभ के कारण आवश्यकता से अधिक उपभोग से कार्बन उत्सर्जन की मात्रा इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि पृथ्वी का तापमान जीवन के लिए सुरक्षित नहीं रहा। ग्लेशियर टूटकर झीलों में पहुंच जाते हैं और जल प्रवाह रोक देते हैं।वहां पर गर्मी के कारण पिघलते हुए बर्फ से जल जमाव बहुत ज्यादा हो जाता है। प्राकृतिक बांधों के टूटने से बहुत बड़ी जलराशि से नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है। नदियां अपने पुराने मार्ग पर बहने लगती हैं जिसकी चपेट में बस्तियों की बस्तियां जल के प्रवाह में डूब जाती हैं।
सैकड़ों लोगों की मृत्यु का समाचार आ चुका है, हजारों लोग अपने परिजनों का ठिकाना नहीं पा रहे हैं और लाखों लोग बेघर हो गए हैं। नेपाल का पानी बिहार की नदियों में पहुंचता है जिसके कारण कोसी जैसी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है जिसके बाढ़ से चारों तरफ हर साल तबाही मच जाती है। जल ही जीवन है हम पढ़ते आए हैं किंतु बहुत ज्यादा जल का आवक जिन नदियों में हो जाता है,वह जीवन लेने वाली बन जाती हैं क्योंकि हमने प्रकृति में जरूर से ज्यादा हस्तक्षेप कर दिया है।
ऋग्वेद कहता है कि 'ऋतस्य यथा प्रेत' अर्थात् प्रकृति के अनुसार जियो। ओशो कहते हैं कि पश्चिम की दृष्टि ने प्रकृति को अपने अनुसार नियंत्रित ही नहीं बल्कि जीतने की दिशा में कदम बढ़ाया है जिसका परिणाम यह है कि श्वास लेने को शुद्ध वायु राजधानियों में नहीं रही, पीने को शुद्ध जल दुर्लभ हो गया है, हरे-भरे वृक्षों के कहीं दर्शन नहीं होते। पूरब के ऋषियों ने प्रकृति की शक्तियों को दैवीय स्वरूप में प्रतिष्ठित कर उनके अनुसार जीवन को ढालने की प्रार्थना की थी।
नेपाल का विनाश उन प्रार्थनाओं से दूर होने का नतीजा है। प्रकृति के साथ जीने की कला हम यदि नहीं विकसित कर पाए तो आचार्य प्रशांत कह रहे हैं कि ग्लेशियर के टूटने और पिघलने से नदियों में पहले बाढ़ आ रही है और बाद में ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय जैसे पहाड़ खत्म हो जाएंगे। फिर उससे निकलने वाली सारी नदियां सूख जाएंगी, तब मानव सूखा पड़ने से बूंद-बूंद पानी के लिए तरस जाएगा।
बार-बार की विपदा हमें चेतावनी दे रही है कि प्रकृति की शक्तियों की पूजा करने वाले ऋषियों के समान सादा जीवन उच्च विचार के मूल सिद्धांतों की ओर लौटें।
ऊं शांति:शांति:शांति:🙏🙏🙏
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹