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🙏शिक्षक दिवस की शुभकामना🙏


जेन जी और अल्फा जेन द्वारा सवाल उठाने का साहस गहरी जिज्ञासा का परिचायक है। 'अथातो ब्रह्म जिज्ञासा' , 'अथातो भक्ति जिज्ञासा' के बाद नई पीढ़ी में 'अथातो शिक्षा जिज्ञासा' शुरू हो चुकी है-एक दृष्टि🔥


संवाद


"शिक्षक दिवस का विशेष उपहार"


शिक्षक दिवस के पूर्व आज का दिवस मेरे लिए विशेष उपहार का दिवस रहा। यह विशेष उपहार प्रश्नों का उपहार था। 2 घंटे लगातार क्लास में बोलने के बाद मैं काफी थक चुका था, तभी छात्राएं आईं और उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि एक कक्ष में सभी छात्राएं एकत्रित हैं और आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हैं।यह वाक्य सुनकर मुझे इतनी खुशी हुई कि मैं अपनी थकान भूल गया।


          शैक्षिक दृष्टिकोण से पिछड़ा हुआ बांसवाड़ा खासकर कोरोना काल से प्रश्न पूछने की कला ही भूल गया था। शिक्षकों की शिकायत रहती थी कि विद्यार्थी प्रश्न क्यों नहीं पूछते? आज विद्यार्थी स्वयं ही चलकर अकस्मात् मेरे सामने प्रश्न पूछने आ गए।


          उच्च शिक्षा के 30 वर्षों के अनुभव में उत्थान का काल भी देखने को मिला और अवसान का काल भी।शिक्षा सेवा की शुरुआत का एक समय था, कॉलेज में मेरी क्लासेज भरी रहती थी और मुझे भी स्वयं को आदर्श शिक्षक साबित करने का बड़ा अरमान था। बहुत तैयारी करके क्लास में जाता था और बड़े मनोयोग से पढ़ाता था। क्लास के बाद भी विद्यार्थियों के साथ कुछ प्रश्नों की चर्चाएं हो जाया करती थीं। उनमें से कुछ विद्यार्थी इतने जिज्ञासु निकले कि वे अपने प्रश्नों को लेकर मेरे घर पर आ जाया करते थे।


             विद्यार्थियों के कभी भी आ जाने से घर गृहस्थ के घर जैसा कम कॉलेज जैसा ज्यादा लगता था। अंत में व्यवस्था बनाई गई कि रविवार को सुबह 6:00 से 9:00 बजे तक चर्चा होगी। रविवार की चर्चा की तैयारी के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ती थी। नए विषय के चयन से लेकर उसके विभिन्न पक्षों को जानने का प्रयास करना पड़ता था। बांसवाड़ा की प्रतिभाएं आने लगीं और चर्चा का रंग जमने लगा।


            समाचारपत्रों ने भी छात्रों और शिक्षक के इस संवाद को स्थान देना शुरू किया और 'गुरु शिष्य संवाद केंद्र' के नाम से समाचार में खबरें आने लगीं।


             मैंने सोच विचार कर इस केंद्र का नाम 'शिष्य-गुरु संवाद केंद्र' कर दिया। भारतीय संस्कृति ने गुरु की महिमा गाने के बावजूद यह महसूस किया था कि शिष्य का प्रश्न गुरु को गुरुता प्रदान कराता है। शिष्य केंद्र में होना चाहिए क्योंकि भविष्य नई पीढ़ी का है। अतः मैंने शिष्य को पहले रख दिया।


                  विद्यार्थियों के प्रश्नों को मैं सुनता रहा और उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढता रहा। आज मेरे जीवन का अधिकांश समय यदि पढ़ने और पढ़ाने में व्यतीत होता है तो इसका ज्यादा श्रेय प्रश्न पूछने वाले शिष्यों को जाता है। शिक्षा जगत में जब बांसवाड़ा में बहुत सारे प्राइवेट कॉलेज खुल गए तो कॉलेज के प्रतिभाशाली विद्यार्थी सरकारी शिक्षा संस्थान छोड़ने लगे। सरकारी कॉलेज में क्लासेज कम होने लगीं और शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्यों में ज्यादा नियोजित किया जाने लगा।


              कोरोना काल के दौरान तो शिक्षा लगभग ठप्प हो गई। बिना पढ़े विद्यार्थियों को पास किया जाने लगा और शिक्षा के नाम पर ऑनलाइन शिक्षा काम करने लगी।यह विपत्ति काल था, अतः इसमें कुछ विशेष नहीं किया जा सकता था। किंतु कोरोना काल के बाद शिक्षा में जो लर्निंग गैप आया और विद्यार्थी शिक्षक के बीच जो दूरी बढ़ी, उसके कारण मेरा कॉलेज मुझे महाविद्यालय कम कार्यालय ज्यादा दिखने लगा।


             ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से भी मेरे विद्यार्थी मुझसे जुड़े रहे और अपने प्रश्नों को पूछते रहे। शिक्षक अपने आप को अपने विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श बनाकर रखना चाहता है। इस कारण से नए-नए विषयों को पढ़ना और नए-नए विषयों की लिखित और मौखिक अभिव्यक्ति देना मेरा जारी रहा। घर से दूर होने के कारण विद्यार्थी मेरे लिए एक परिवार के सदस्य की तरह हो गए। विद्यार्थियों को मुझसे कितना सीखने को मिला यह तो विद्यार्थी बताएंगे किंतु मैं जानता हूं कि विद्यार्थियों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।


            आज जब विद्यार्थियों ने अपने प्रश्न रखे तो उसमें एक दर्द था ,अपने भविष्य को लेकर आशंका थी और एक विद्रोह का भाव भी था। जेन जी और जेन अल्फा के आंदोलनों का असर अब बांसवाड़ा में साफ दिखाई देने लगा। अब शिक्षा जगत में बहुत बड़ा परिवर्तन होना लाजिमी है।


            जब विद्यार्थी अपने प्रश्न उठाने लगेंगे तो उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक हो जाएगा। शिक्षकों की गौरव-गरिमा उनकी प्रतिभा को गैर शैक्षिक कार्यों में लगा देने से बहुत गिरी है। शिक्षण कार्य के महत्वपूर्ण होते ही शिक्षक समाज ही नहीं सरकार के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण हो जाएगा। इसका कारण यह है कि राष्ट्र का निर्माण क्लास में होता है जो शिक्षकों के हाथ में है।


अतः यह भी जरूरी है कि श्रेष्ठ प्रतिभाएं शिक्षा क्षेत्र में आएं।


             प्रश्नोपनिषद लिखने वाला यह देश जब प्रश्न को उठाने लगेगा तो उपनिषद काल याद आ जाएगा। उपनिषद का अर्थ होता है -गुरु के समीप निष्ठा पूर्वक बैठना। अपने पढ़ाने वालों के समीप मैं निष्ठापूर्वक बैठा और मेरी जिंदगी सुधर गई तो मुझे आशा है कि आज की नई पीढ़ी जब अपने शिक्षकों के समीप बैठेगी तो उसके भी जीवन में सुधार आएगा।


           अतः यह शिक्षक दिवस मेरे लिए विशेष है और यह उपहार मुझे एक सुनहरे भविष्य की झलक दिख रहा है। यद्यपि प्रश्न पूछने वाले विद्यार्थी गिनती में बहुत कम थे किंतु प्रश्न पूछने की शुरुआत बहुत महत्वपूर्ण है। आशा है कि अन्य विद्यार्थियों में भी जिज्ञासा जगेगी; क्योंकि


"शिक्षक स्वयं जिज्ञासा है


खुद कुआं है पर प्यासा है।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹