/start


🙏स्त्री को पीटने और उसका मुंडन करने वाले तथा हंसते हुए वीडियो बनाने वाले तो वहां बहुत मिले किंतु अन्याय का विरोध कर नैतिक साहस दिखाने वाला एक भी नहीं;क्योंकि जिंदा शिक्षक जहां नहीं होता वहां का समाज मर जाता है-एक दृष्टि😭


संवाद


"संवेदना जगती है जिंदा शिक्षक से"


शिक्षक दिवस मेरी नजर में जिम्मेदारी के एहसास को महसूस करने का विशेष दिवस है। बांसवाड़ा में और दिल्ली में घटी घटना ने रातों की नींद हराम कर दी। बांसवाड़ा में एक औरत को भीड़ पीटती रही, उसका मुंडन करती रही और लोग हंसते हुए वीडियो बनाते रहे। दिल्ली में महिला पत्रकार को पुलिस द्वारा थाने में पीटा गया।


               शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था- संवेदना को जगाना। स्त्री हो या पुरुष; सबमें आई हुई आत्मा तो परमात्मा का अंश है। 3 महीने तक तो पता भी नहीं चलता कि स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़का है या लड़की?तीसरे महीने में लिंग निर्धारण का पता चलता है और लड़कियों को गर्भ में ही गिरा दिया जाता है। कहीं भूल से जन्म ले लीं तो पग पग पर भेदभाव किया जाता है। स्त्री के गर्भ से जन्म लेने वाले पुरुषों की दुनिया में मुनिया अपने सपने बुनती हैं और पितृसत्तात्मक समाज उन सपनों को तोड़ता रहता है।


              जिस डाली पर बैठा था उसी डाली को बचपन में एक मूर्ख काट रहा था, वही मूर्ख बाद में शिक्षा से महाकवि कालिदास बना जिसने संवेदना को जगाने वाले ग्रंथों की रचना की। उस शिक्षा का प्रसार जितना होगा उतना ही संवेदना जगेगी और यह समझ आएगी कि-आत्मवत् सर्वभूतेषु य:पश्यति स पंडित:।


                    किंतु शिक्षा के व्यवसायीकरण ने शिक्षा को सिर्फ रोजगार से जोड़ दिया और संवेदना से तोड़ दिया। इसके फलस्वरुप तथाकथित शिक्षा नगरी में एक तरफ विद्यार्थी आत्महत्या कर रहे हैं और दूसरी तरफ गिनती के सफल विद्यार्थियों का जश्न अनगिनत अरमानों की लाशों के ढेर पर मनाया जा रहा है।


            भारतीय संस्कृति की शिक्षा-'सत्यं वद,धर्मं चर' वाले जीवन के लिए थी। सत्य बोलना जब लोग छोड़ देते हैं और अधर्म के रास्ते पर निकल पड़ते हैं तब अन्याय और आतंक जीवन में चारों तरफ दिखाई देने लगता है। अर्धनारीश्वर का यह देश अपनी आधी आबादी के साथ हो रहे भेदभाव और अन्याय का हंसते हुए वीडियो बनाता है किंतु उसे रोकने का साहस नहीं दिखाता। इसका मतलब है कि आत्मा मर चुकी है और नैतिक साहस खत्म हो चुका है-


'अक्ल बारीक हुई जाती है


रूह तारीक हुई जाती है।'


                शिक्षा का उद्देश्य आत्मजागरण है। आत्मा व्यक्ति को कहीं भी गलत होते हुए देखने पर रोकती है, टोकती है। आत्मा दूसरे व्यक्ति को कंटेंट नहीं समझती जिसका वीडियो बनाकर लाइक्स प्राप्त कर लिया जाए। कभी गर्भ में मारने वाले, लड़का लड़की में भेद करने वाले और कभी सती प्रथा के नाम पर जिंदा जलानेवाले समाज में चरित्र का प्रश्न सिर्फ स्त्रियों के लिए है। अब तो लड़कियां इन सवालों को भी भूल कर शिक्षा के द्वारा अपने आंखों के ख्वाबों को पूरा करने के लिए शिक्षक पाना चाहती हैं जो उनके मर चुके अरमानों को जगा दे और जगत को सुंदर बनाने का हौंसला दे-


कहां सवालों के तुमसे जवाब मांगते हैं


हम तो अपनी आंखों के हिस्से का ख्वाब मांगते हैं।


             लड़का या लड़की में शिक्षा भेदभाव नहीं करती, वह तो अंतर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। प्राय: लड़का मस्तिष्क प्रधान होता है और लड़की हृदय प्रधान होती है। मस्तिष्क और हृदय दोनों के विकसित होने से यह जीवन और जगत सुंदर और समृद्ध बनता है। आज की तथाकथित शिक्षा ने अक्ल तो बहुत बढ़ाई किंतु हृदय और आत्मा पर ध्यान नहीं दिया। प्रेम प्रधान हृदय में जागृत आत्मा निवास करती है। जब हृदय में प्रेम की जगह घृणा भर जाए तब आत्मा अंधेरे में डूब जाती है और 'स्वतंत्र भारद्वाज' बन जाती है। ऐसी आत्माएं ही महिलाओं को कभी चरित्र के नाम पर तो कभी जाति धर्म के नाम पर प्रताड़ित करने लगती हैं।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹