जेनरेशन गैप कम कैसे हो
September 7, 2026🙏नई पीढ़ी में विद्रोह का भाव बढ़ता जा रहा है और पुरानी पीढ़ी पुराने मूल्यों की दुहाई देती जा रही है जिसके कारण जेनरेशन गैप ज्यादा बड़ा होता जा रहा है-एक अनुभवसिक्त विश्लेषण 🔥
संवाद
'जेनरेशन गैप कम कैसे हो'
शिक्षक दिवस की शाम मेरे लिए विशेष हो जाती है। एक विद्यार्थी 1996 में आने के बाद कॉलेज में मुझसे जुड़ा। क्लास में नियमित आता और प्रश्नों को क्लास के बाद भी उठाता। उसकी जिज्ञासा इतनी थी कि घर पर भी पहुंच जाता। ऐसे जिज्ञासुओं के कारण रविवार को शिष्य गुरु संवाद चलता। जिसकी इतनी जिज्ञासा हो उसको सफलता अवश्य मिलती है और वह संस्कृत का प्रथम श्रेणी शिक्षक बना।
उसे देखकर एकलव्य की याद आ जाती है। 25 वर्षों से कोई भी शिक्षक दिवस ऐसा नहीं आया जब वह शाम में मेरे घर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने न आया हो। ऐसे विद्यार्थियों से मुझे काफी कुछ सीखने को मिलता है। सारे विद्यार्थियों को मैंने उतना ही ध्यान और ज्ञान दिया किंतु कृतज्ञता का भाव उसमें बहुत विशेष है।
अब पति-पत्नी दोनों प्रिंसिपल हैं और दो प्यारी बिटिया हैं। शिक्षक दिवस की इस शाम शिक्षा से ज्यादा 'जेनरेशन गैप' पर गहरी चर्चा हुई। बिटिया कह रही थी कि मैं जब भी प्रश्न उठाती हूं, पापा बोलते हैं कि ज्यादा बहस मत करो। यह प्रश्न नई पीढ़ी के हर विद्यार्थी का है और खासकर छात्राओं को तो यह विशेष रूप से सुनना पड़ता है।
मेरी पीढ़ी में अनुभव ही जानने का आधार था। बड़े ज्यादा अनुभवी होते थे और इसलिए ज्यादा जानते थे।तब बड़ों के सामने बोलना भी अवज्ञा मानी जाती थी और प्रश्न उठाना तो अपमान करने के समान लिया जाता था। लेकिन आज की नई पीढ़ी के युग में सूचनाओं का विस्फोट हो गया है और मोबाइल फ्रेंडली होने के कारण उन्हें जितनी ज्यादा जानकारियां हैं, उतनी पुरानी पीढ़ी को नहीं है। इस कारण से जेनरेशन गैप आज कुछ ज्यादा बड़ा हो गया है।
पितृ सत्तात्मक समाज में पुरुषों की प्रधानता के कारण जहां स्त्री को बोलने का ज्यादा अधिकार नहीं दिया गया था, वहां आधुनिक शिक्षा ने लड़कियों को इतना साहस से भर दिया कि वे सवालों को उठाने में भाषा की मर्यादा का भी उल्लंघन करने लगीं। जंतर मंतर के प्रदर्शन के बाद तो नई पीढ़ी की भाषा का विश्लेषण किया जाने लगा है, खासकर लड़कियों की भाषा पर तो आश्चर्य व्यक्त किया जाने लगा है। अब जेनरेशन गैप बड़ा ही नहीं तीखा भी हो गया है-
'खिलौनों के बदले में बारूद दी
बच्चों में अब गुलफिशानी कहां?
जलाकर शमा पूछते हो आप
पतंगों की अब जिंदगानी कहां?'
शिक्षक होने के साथ पिता भी हूं और दो बेटों के संग साथ रहकर जेनरेशन गैप को अनुभव भी किया। मुझे किसी ने समझाया कि नई पीढ़ी तुम्हारे वचन से कम आचरण से ज्यादा सीखती है। जितना ही इस मंत्र को मैंने जीवन में महसूस किया, उतना ही आज्ञा देने का भाव कम होता गया। दूसरी बात मैंने देखा कि माता-पिता से ज्यादा विद्यार्थी के मन पर शिक्षक का और संगति का प्रभाव होता है। तीसरी बात मैंने पाई कि आज की शिक्षा में प्रतिस्पर्धा का भाव ज्यादा है और विद्यार्थी ज्यादा तनाव में है।
ऐसे में मां-बाप भी यदि उन्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं का साधन बनाते हैं तो जीवन में उन्हें प्यार कौन देगा? मेरे बचपन में परिवार के पास पैसे कम थे किंतु प्यार बहुत ज्यादा था,इस कारण मुझे खेलने की भी काफी छूट मिली और पढ़ने में भी मेरी गति हो गई क्योंकि शिक्षक और सीनियर्स का भी प्रेम और प्रशिक्षण मिल गया।
बच्चों से ज्यों ही मैंने अपनी अपेक्षा छोड़ दी,त्यों ही कुछ जबरदस्ती थोपने का भाव कम हो गया। बच्चे स्वयं ज्यादा मेहनत कर रहे हैं और उस पर से पेपर लीक जैसी व्यवस्था का सामना कर रहे हैं ; ऐसे में मां-बाप का कर्तव्य क्या है? अपनी बातों और व्यवहारों से उनके तनाव को बढ़ाना या अपने प्यार से उनके टूटे हुए दिल को सहलाना।
नई पीढ़ी के पास सूचनाएं ज्यादा है अनुभव कम और पुरानी पीढ़ी के पास अनुभव ज्यादा है सूचनाएं और तकनीकी ज्ञान कम। मुझे बहुत बातें बच्चों से सीखनी पड़ती हैं। भारतीय संस्कृति ने तीन प्रकार के बड़ों का जिक्र किया है- आयुवृद्ध,ज्ञानवृद्ध,तपोवृद्ध। इसमें से मुझे लगता है कि नई पीढ़ी से आयु में ही मैं बड़ा हूं किंतु ज्ञान और तप में वे ज्यादा बड़े हैं।
मेरी तरुणावस्था में तो किसी प्रकार का विशेष दबाव मां-बाप की तरफ से नहीं था किंतु आज की नई पीढ़ी के सामने चारों तरफ से सफलता का भारी दबाव है। 'एक अनार सौ बीमार' की जगह 'एक अनार करोड़ बीमार' वाली व्यवस्था बना दी गई जिसमें नई पीढ़ी अवसाद में जा रही हैं और आत्महत्या तक कर रही हैं।
नई पीढ़ी के साथ मैं लगातार संवाद कर रहा हूं और मेरी संवेदना उनके साथ हैं। ओशो से मुझे यह सत्य मिला कि धनुष जितना ज्यादा झुकता है,तीर उतना ही दूर तक जाता है। पुरानी पीढ़ी जितना ज्यादा प्यार से नई पीढ़ी के प्रति भरेगी, उतना ही ज्यादा नई पीढ़ी आगे जाएगी।
नई पीढ़ी शिक्षा और संस्कार के रास्ते पर हैं तो पुरानी पीढ़ी को सफलता की उतनी चिंता नहीं करनी चाहिए जितनी सुफलता की। मुन्ना भाई एमबीबीएस बनने वाली सफलता से ज्यादा अच्छा है,सही साधन से सही साध्य तक पहुंचने की कोशिश करना।
नई पीढ़ी से इतना ही अपेक्षा है कि वे इस बात को समझें कि मां-बाप उनकी ही सुरक्षा की चिंता में उन पर ज्यादा कठोर हो जाया करते हैं-
'जिसका हृदय जितना समीप है वही दूर जाता है
और क्रोध आता उस पर ही जिससे कुछ नाता है।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹