सत्य निकेतन का मलबा
September 9, 2026/start
🙏दिल्ली के सत्य निकेतन के मलबे में जीवन बनाने वाली शिक्षा की खोज में गए हुए युवा दबकर मर गए-शोक संवेदना😭
संवाद
"सत्य निकेतन का मलबा"
सत्य निकेतन के मलबे में दबकर मरे युवाओं के चेहरे देखते ही अपने छात्र जीवन की याद आने लगी। अभाव वाले घर से निकल कर बड़े सपनों का पीछा करना कितनी कठिन तपस्या की मांग करता है। गांव छोड़कर शहर में आना और पैसे बचाने के लिए रहने से लेकर खाने तक की हर चीज में रियायत खोजना प्रतिदिन का जद्दोजहद बन चुका था। घर की माली हालत और मां-बाप की गाढ़ी कमाई को देखते हुए महंगी कोचिंग का खर्च भी बहुत अखरता था। हमारे समय में सरकारी स्कूल और कॉलेज ऐसे थे कि बहुत कम फीस में बहुत अच्छी पढ़ाई करवा कर बड़े सपने जगा दिए किंतु उन सपनों को पूरा करने का जो कोचिंग वाला स्थान और सिस्टम था,वह अपनी पहुंच से बाहर का था।
उस कोचिंग सिस्टम की तलाश में आए हुए एक सी पृष्ठभूमि के साथियों के बीच में अभाव ज्यादा अखरता नहीं था क्योंकि 12-14 घंटे की पढ़ाई के द्वारा सपने सच होने का पूरा भरोसा था। आशा इतनी रंगीन होती है कि अभाव की तरफ ध्यान ही नहीं जाता। उदाहरण के लिए पैसे इतने कम थे कि शर्ट पैंट भी एक दूसरे का पहन कर काम चला लेते थे। 'दो रोटी कम खाएंगे, किताब नई लाएंगे' का नारा हम लोगों को इतनी ताकत दे देता था कि 'मन लागो यार फकीरी में' भजन गुनगुनाने लगते थे।
व्यवस्था उस समय ऐसी थी कि प्रतियोगिता परीक्षाएं समय पर होती थी और परिणाम भी आशानुकूल आ जाते थे। तभी तो मेहनत का मीठा फल अपनी अपनी प्रतिभा और परिश्रम के अनुसार लगभग सभी को मिला। गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलकर खुशहाली आई किंतु आज के युवाओं की हालत को देखकर चेहरे पर हंसी नहीं आ रही बल्कि दिल गम से भरा हुआ है-
'मलबों में दबी लाश हैं हम किस तरह हंसें
युवा सब बदहवास हैं हम किस तरह हंसें।'
जब आज की पेपर लीक वाली व्यवस्था और सरकारी शिक्षण संस्थानों की दुर्दशा को देखता हूं तो मुझे लगता है कि आज के युवाओं का जीवन कितना मुश्किल बना दिया गया। अवसाद से लेकर आत्महत्या तक की घटना बता रही है कि नाकामी से हमारे युवा नहीं टूट रहे हैं बल्कि नाउम्मीदी ने उन्हें तोड़ दिया है-
'दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।'
हमारे समय के युवाओं की शाम ही नहीं रात भी खत्म हुई और जीवन में सवेरा आया किंतु आज के युवाओं की शाम कभी न खत्म होने वाली घनघोर अंधेरी रात की ओर बढ़ती जा रही है। न पढ़ाई ठीक, न परीक्षा ठीक,न रहने का जगह ठीक, न कॉलेज की शिक्षा ठीक; आखिरी युवाओं का यह देश युवाओं को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए और मरने के लिए क्यों छोड़ दिया? अपनी प्रतिभा और परिश्रम से गरीबी के दुष्चक्र से निकलने का रास्ता आखिर कैसे बंद हो गया?
हमारी भतीजी दिल्ली में रहती है। बचपन से ही वह दिन-रात पढ़ाई में मशगूल रहती है। प्रतिभा इतनी प्रखर है कि हर परीक्षा में टॉपर्स में उसका नाम रहा। यदि व्यवस्था ठीक रही और ईमानदार परीक्षा हुई तो वह अपने मुकाम को अवश्य हासिल कर लेगी लेकिन पेपर लीक और भ्रष्टाचार वाली व्यवस्था में सफलता की आशा धूमिल होने लगती है।सत्य निकेतन की खबर सुनते ही उसकी सलामती जानने के लिए बेचैन हो गया। उसके महफूज होने की खबर से दिल को राहत मिली लेकिन ऐसी ही प्रतिभा रखने वाले कई युवा अव्यवस्था की बलि चढ़ गए। 'राम नाम सत्य है' किंतु यह जीवन का अंतिम सत्य है। भरी जवानी में बड़े अरमानों को जिंदा दफनाने वाले हादसों का जिम्मेवार कौन है?
प्रदर्शन की राजनीति ने शिक्षा और परीक्षा की ऐसी नीति बना दी है कि जिसमें भारत की प्रतिभाएं या तो मरने को मजबूर हैं या देश छोड़ने को मजबूर हैं। भारतीय दर्शन से निकली नालंदा और तक्षशिला की शिक्षण संस्थाएं कभी विश्व की प्रतिभाओं को आकर्षित करती थीं और आज उस दर्शन से दूर होकर हमारी शिक्षण संस्थाएं प्रतिभाओं को लूटने वाली या नष्ट करने वाली होती जा रही हैं।
विनम्र श्रद्धांजलि!ओम् शांति:शांति:शांति:!
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹