स्त्री के प्रति दृष्टि का सवाल
September 11, 2026🙏फ्रांस में एफिल टावर पर हिंदू धार्मिक संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा स्त्रियों से बचने की परंपरा पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है और टावर प्रबंधन ने स्त्रियों को उनकी ड्यूटी से संन्यासियों के विजिट समय के लिए हटाकर एक विवाद को जन्म दे दिया है-एक दृष्टि🔥
संवाद
"स्त्री के प्रति दृष्टि का सवाल"
हिंदू धर्म के स्वामीनारायण संप्रदाय के संन्यासी स्त्री दर्शन से बचते हैं।फ्रांस में एफिल टावर के भ्रमण के दौरान उनके अनुरोध पर स्त्रियों की अनुपस्थिति को सुनिश्चित करने का काम टावर प्रबंधन ने किया। संन्यासियों के विजिट के समय स्त्रियों को ड्यूटी से हटाकर उनकी जगह पुरुषों को लगाया गया।इसके विरोध में कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया जिसके कारण एफिल टावर को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। भारी विरोध को देखते हुए पेरिस प्रशासन इस मामले की जांच कर रहा है।
किसी की धार्मिक परंपरा का सम्मान होना चाहिए किंतु वह किसी सार्वजनिक स्थान पर लैंगिक भेदभाव का जब आधार बन जाती है तो कई गहरे प्रश्न खड़ी कर देती हैं। खासकर जब फ्रांसीसी क्रांति के मुख्य नारे 'स्वतंत्रता,समानता और भ्रातृत्व' की मूल भावना को चोट पहुंच रही हो तो इस मुद्दे पर फ्रांस में उठे विरोधी स्वर को समझने का प्रयास होना चाहिए। साथ ही भारतीय संस्कृति और दर्शन के दृष्टिकोण से भी इस पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए।
फ्रांसीसी गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष संविधान सार्वजनिक स्थल पर स्त्री और पुरुष के भेदभाव को अस्वीकार करता है। यही कारण है कि वहां के जनप्रतिनिधियों ने भी सार्वजनिक स्थल पर हिंदू संन्यासियों के स्त्री दर्शन के निषेध को अस्वीकार्य माना है।
स्त्रियों से बचने की धार्मिक परंपरा भारत में पहले भी रही है।महात्मा बुद्ध अपने संघ में स्त्रियों को प्रवेश नहीं देना चाहते थे। पालन-पोषण करने वाली माता गौतमी और अपने शिष्य आनंद के अनुरोध पर उन्होंने स्त्रियों को संघ में प्रवेश तो दे दिया किंतु साथ ही यह भी कह दिया कि अब हमारा धम्म बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता। साधारण मानव के मनोविज्ञान को जानकर जो आशंका बुद्ध ने व्यक्त की थी, वह सही साबित हुई। बौद्ध मठों में व्यभिचार फैल गया जो भारत से बौद्ध धर्म के लोप होने का बहुत बड़ा कारण बना।
किंतु ओशो ने अपने नवसंन्यास में स्त्री और पुरुष दोनों को समान अधिकार दिया। उन्होंने गौतम बुद्ध तथा अन्य आध्यात्मिक गुरुओं द्वारा स्त्रियों के साथ किए गए भेदभाव को गलत बताया।
अर्धनारीश्वर का यह देश भारत एक तरफ सिद्धांत में देवीपूजक भी है और दूसरी तरफ व्यवहार में स्त्रियों को नर्क का द्वार भी बताता है। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' को अपना आदर्श वाक्य भी मानता है तो दूसरी तरफ स्त्री को स्वतंत्रता के योग्य भी नहीं मानता है-'न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति'. यहां कुमारी पूजन की परंपरा भी है तो गर्भ में ही स्त्री शिशु को मारने का रिवाज भी है।
आज के आधुनिक युग में जब 'लड़का लड़की एक समान, भेदभाव का मिटे निशान' के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ा जा रहा है और सभी क्षेत्रों में महिला भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है तो ब्रह्मचर्य-प्रणाली और संन्यास-परंपरा के पालन के नाम पर स्त्रियों को दूर रखने की दृष्टि का कितना औचित्य है?
स्त्रियों के साथ भेदभाव के कारण आधी आबादी की क्षमता का सदुपयोग नहीं हो पाता। यही कारण है कि हमारा संविधान किसी भी आधार पर भेदभाव को पूर्णतया निषिद्ध करता है। भारतीय संस्कृति में ज्ञान की दृष्टि से उपनिषद का काल चरमोत्कर्ष था। उस समय स्त्री और पुरुष को शिक्षा का समान अधिकार था और वाद-विवाद में विद्वानों के साथ विदुषियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उपनिषदकालीन ऋषि गृहस्थ आश्रम में रहते थे और स्त्रियों के सहयोग से संन्यासी के समान त्याग तपस्या का जीवन भी जीते थे।
स्त्री और पुरुष को प्रकृति ने प्रतियोगी नहीं, परिपूरक बनाया है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुष की प्रधानता के कारण जब स्त्रियों को दोयम दर्जे का मान लिया जाता है तो उसे साधन समझकर उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। आध्यात्मिकता और वैज्ञानिकता से पूर्ण शिक्षा में हर व्यक्ति स्वयं में साध्य होता है और किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव संभव नहीं है। व्यवहारिक दृष्टिकोण से परंपरा में कुछ भेदभाव किया जाता है तो उसकी सार्थकता और निरर्थकता पर जागरूक दृष्टि से विचार होना चाहिए।
हिंदू धर्म के कुछ संन्यासियों द्वारा एफिल टावर पर स्त्री दर्शन से बचने के कारण जो विवाद उठ रहा है, उसकी पृष्ठभूमि में हिंदू संन्यासी स्वामी विवेकानंद याद आ रहे हैं जिन्होंने हिंदू धर्म की एक विराट और सर्वसमावेशी छवि शिकागो धर्म सम्मेलन में अपने व्याख्यान के द्वारा बनाई थी। चिंतन का मूल बिंदु यही है कि हिंदू धर्म का कौन
सा स्वरूप हम चाहते हैं-विवेकयुक्त विराट हिंदू धर्म का स्वरूप या अंधविश्वासयुक्त संकीर्ण हिंदू धर्म का स्वरूप?
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹