🙏गणेश चतुर्थी और हिंदी दिवस की शुभकामना🙏


🎉गणेश मंडपों का उपयोग जिस प्रकार से तिलक ने 'राष्ट्र चेतना' को जगाने के लिए किया था, उसी प्रकार से हिंदी भाषाभाषियों की चेतना को जगाने के लिए गणेश मंडपों का सदुपयोग हो-एक दृष्टि🔥


संवाद


"गणेश मंडप और हिंदी चेतना"


गणेश चतुर्थी के दिन हिंदी दिवस का संयोग एक विशेष संदेश देता है। भारतीय संस्कृति में 'ओम् गणेशाय नमः' के साथ विद्यारंभ होता था। अक्षर के देवता गणेश दार्शनिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अक्षर ज्ञान का बीज है, स्मृति का आधार है और संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। उपनिषदों में ब्रह्म के लिए भी अक्षर शब्द आया है‌। गीता में श्री कृष्ण स्वयं को अक्षरों में अकार बताते हैं-'अक्षराणामकारोअस्मि'-


'देखे को अनदेखा कर दे, अनदेखे को देखा


क्षर लिख लिख तू रहा निरक्षर,अक्षर सदा अलेखा।'


अर्थात् हमारी संस्कृति में 'अक्षर' उसे कहा गया है जो कभी नष्ट न होता हो-न क्षरति इति अक्षर:। पौराणिक काल में अक्षर के देवता गणेश वक्रतुंड महाकाय रूप में प्रचलित हो जाते हैं।


            14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था, तब से 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में हम मनाते हैं। राजभाषा होने के बावजूद हिंदी भाषा की और हिंदी भाषाभाषी की स्थिति चिन्तनीय है। भारत के प्रशासनिक, न्यायिक और अन्य महत्वपूर्ण कार्य की मुख्य भाषा अंग्रेजी है। अंग्रेजी और हिंदी के लेखन में अंतर होने पर और विवाद उत्पन्न होने पर हिंदी के देश में अंग्रेजी को ही प्रमाणिक माना जाता है। दक्षिण में तो 'इंग्लिश एवर,हिंदी नेवर' का नारा देकर हिंदी का विरोध चरम पर पहुंचा दिया गया है।


               राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की क्रियान्विति में हिंदी भाषा को लेकर जितना तीव्र विरोध तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में देखने को मिल रहा है,वह विरोध राष्ट्रीय एकता और अस्मिता के लिए एक चिंतनीय मुद्दा है। 'हिंदी,हिंदू,हिंदुस्तान' का नारा देने वाली सरकारों के होते हुए भी हिंदी माध्यम के स्कूल बंद होते जा रहे हैं और गली मोहल्ले में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुलते जा रहे हैं। अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का प्रावधान है, सर्वाधिक लोगों की मातृभाषा हिंदी है इसके बावजूद अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की वृद्धि यही दर्शाता है कि हिंदी भाषा के समृद्ध होने के बावजूद हिंदी भाषाभाषियों ने अक्षर के देवता गणेश की सही मायने में भक्ति नहीं की अन्यथा स्थिति दूसरी होती।


               गणेश विद्या,बुद्धि और लेखन के देवता हैं। महाभारत लेखन के समय गणेश जी के साथ व्यास जी का जो संवाद हुआ है, वह बताता है कि अपने ज्ञान को संरक्षित रखने के लिए और संवर्धित करने के लिए कितनी कड़ी तपस्या और कैसी प्रखर चेतना की आवश्यकता है। आज के हिंदी भाषाभाषियों में अपनी हिंदी भाषा के लिए न तो वह तपस्या दिखाई दे रही है और न वैसी प्रखर चेतना।


             संस्कृत,प्राकृत,अपभ्रंश और विभिन्न लोक भाषाओं के सह अस्तित्व से जन्मी हिंदी स्वयं में बहुत समृद्ध है।भारत की आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा को जिंदा रखने में तुलसी,सूर,कबीर,मीरा और विद्यापति जैसे अनेक कवियों और लेखकों ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। किंतु डिजिटल युग वाली आज की पीढ़ी हिंदी की मूल पुस्तकें नहीं पढ़ती हैं,हिंदी भाषा में अपने विचारों की लिखित या मौखिक शुद्ध अभिव्यक्ति नहीं दे सकती हैं और हिंदी की देवनागरी लिपि को भूलकर रोमन लिपि की ओर बढ़ रही हैं।विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा में ज्ञान,विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रभावी सृजन नहीं हो रहा है।


               इसके विपरीत गणेश चतुर्थी से गणेश चतुर्दशी तक शिक्षालय सूने पड़ जाते हैं और गणेश मंडप गुलजार हो जाते हैं। अक्षर के साधक गणेश को भूलकर हम उन्हीं की मूर्ति के सामने कर्मकांड और नाच-गान में व्यस्त हो जाते हैं। गणेश का बड़ा कान हमें गहन श्रवण के लिए आमंत्रण दे रहा है, विशाल मस्तक हमें व्यापक चिंतन का आह्वान कर रहा है और छोटी आंख हमें सूक्ष्म दृष्टि के लिए प्रेरित कर रही है। गणेश चेतना ने महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ को बिना विश्राम किए कठिन श्रम से संस्कृत भाषा में लिखकर अपनी भावी पीढ़ियों को किसी भी भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष संकेत दिया है।


           दार्शनिक दृष्टि से देखें तो हिंदी भाषा का संकट वस्तुत: चेतना का संकट है। हिंदीभाषी लोगों का अंग्रेजी भाषा के प्रति जिज्ञासा का बढ़ना और हिंदी भाषा के प्रति उपेक्षा का बढ़ना राजभाषा हिंदी के लिए सबसे बड़ा संकट है। हिंदी भाषा का क्षय सिर्फ भाषा का क्षय नहीं है, वह स्मृति,संस्कृति और चिंतन का क्षय भी है ; क्योंकि जिस भाषा में हम सोचते हैं, उसी भाषा में हमारी मौलिक सृजन की क्षमता सर्वाधिक होती है। सोचते तो हम हिंदी में हैं किंतु पढ़ते अंग्रेजी में हैं। जिस


प्रकार से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश मंडपों का सदुपयोग राष्ट्र चेतना जगाने के लिए किया था, उसी प्रकार से हिंदी भाषाभाषियों की चेतना को जगाने के लिए आज गणेश मंडपों का सदुपयोग किया जा सकता है; क्योंकि-


'बिखरे हुए पड़े हैं अक्षर, बिखरी हुई पड़ी हैं कड़ियां


बिखरे हुए पड़े हैं मोती, बिखरी हुई पड़ी है लड़ियां।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹