साधना मूल,चमत्कार फूल
September 18, 2026🙏चमत्कारी पुरुष नीम करौली बाबा पर बनी फिल्म 'हनुमान अंश' रिकॉर्ड तोड़ रही है और कैंची धाम पर चमत्कार की आशा में भीड़ उमड़ रही है। चमत्कार पर एक दृष्टि🙏
संवाद
'साधना मूल,चमत्कार फूल'
'हनुमान अंश' फिल्म देखने पर नीम करौली बाबा के चमत्कारों से मैं अभिभूत हो गया। भूत और भविष्य को देख लेने की उनकी क्षमता और इच्छा मात्र से किसी भी स्थिति में परिवर्तन के दृश्यों ने विज्ञान के कारण कार्य के नियमों के पार किसी अनजाने जगत में पहुंचा दिया। आस्था और तर्क का एक गहरा द्वंद्व खड़ा हो गया।
गहराई से देखने पर ध्यान में आया कि इस जीवन में भी बहुत कुछ अकारण घटता है।जिंदगी ले आती है और मौत ले जाती है जिस पर अपना कुछ वश ही नहीं चलता।जरूर कुछ विधि का विराट विधान है जिसके आगे मनुष्य की सामर्थ्य बहुत छोटी साबित होती है-
'न अपने वश में जिंदगी,न अपने वश में मौत
आदमी मजबूर है और किस कदर मजबूर है।'
तभी ध्यान दशरथ मांझी का आया जिसने पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। वैज्ञानिकों ने अपने बुद्धि और श्रम से संसार को परिवर्तित करके रख दिया। समुद्र की गहराइयों से लेकर आकाश की ऊंचाइयों तक अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए।बड़े-बड़े बांध बनाकर नदियों को बांध दिया। लेकिन तभी ध्यान आया कि नेपाल में ऐसे सारे बांध तिनके की तरह बह गए। उज्जैन में हनुमान की एक मूर्ति प्रशासन के लाख उपाय करने पर भी टस से मस नहीं हुई। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ वहां जमा हो गई और प्रशासन को अपना विचार बदलना पड़ा।
ऐसे में हनुमान के अंश कहे जाने वाले नीम करौली बाबा की इच्छा मात्र से जब ट्रेन रुक जाती है,चल जाती है और घर में अन्न की कमी होने पर भी अन्न का भंडारा भर जाता है तब उनके पीछे चमत्कार से प्रभावित लोगों की भीड़ क्यों नहीं एकत्रित होगी। खासकर जब चेचक को भारत से उन्मूलन करने वाले वैज्ञानिक डॉ. लैरी ब्रिलिएंट और एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स जैसे बुद्धिजीवी भी उनके आगे समर्पित हो जाते हों।
क्षण भर की कृपा मात्र से जब कोई असंभव सा काम हो जाता हो तो आमजन में उसके प्रति अपार श्रद्धा का भाव उमड़ जाना सामान्य मनोविज्ञान के अनुकूल बैठता है। तभी तो जयपुर में मोती डूंगरी की सिंजारे की मेहंदी पाने हेतु लाखों युवक युवतियों की भीड़ एकत्रित हो गई क्योंकि इससे 6 महीने के अंदर में शादी की गारंटी का अफवाह सोशल मीडिया पर फैला दिया गया। मनोकामना इतनी प्रबल है कि डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।
भाग्यवाद और कर्मवाद का संघर्ष बड़ा प्राचीन है।भारत में ब्राह्मण संस्कृति ने अहंकार को शून्य बनाने के उद्देश्य से भाग्यवाद को चरम पर पहुंचा दिया और उन्होंने घोषणा की-
'होंईहे वही जो राम रचि राखा,
क्यों करि तर्क बढ़ावहीं साखा।'
लेकिन जब लोग भाग्य पर भरोसा करके कर्म छोड़ने लगे और चमत्कारों में विश्वास करने लगे तो श्रमण संस्कृति ने कर्म पर जोर दिया जिसकी जड़ गीता में स्पष्ट दिखाई देती हैं-'कर्मण्येवाधिकारस्ते'अर्थात् कर्म में ही तेरा अधिकार है। महावीर और बुद्ध के प्रभाव से ब्राह्मणवाद के विरुद्ध श्रमणवाद लोकप्रिय होने लगा। लोग कारण और कार्य के वैज्ञानिक नियम की ओर मुड़ने लगे।
इसी वैज्ञानिक सोच से आधुनिक युग में पश्चिम में पुनर्जागरण आया। वैज्ञानिकों की बुद्धि और श्रम से तथा विज्ञान के आविष्कारों से अभूतपूर्व क्रांति हुई। भारत में भी पुनर्जागरण आंदोलन चला किंतु तर्क में विश्वास रखने वाले नरेंद्रनाथ दत्त ने मां काली में श्रद्धा रखने वाले रामकृष्ण परमहंस के सामने समर्पण कर दिया। नरेंद्र ने कठोर श्रम किया किंतु अमेरिका के शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए रवाना तभी हुए जब उनके गुरु ने मरने के बाद भी अपने संकेतों से वहां जाने का आदेश दिया। जब बुद्धि की पराकाष्ठा पर पहुंचा हुआ नरेंद्रनाथ दत्त जैसा व्यक्तित्व औपचारिक शिक्षा से वंचित मां काली के भक्त रामकृष्ण परमहंस की कृपा से विवेकानंद बन जाते हैं तो इसमें परिश्रम से ज्यादा प्रसाद नजर आता है जिसे दुनिया चमत्कार कहती है।
दुनिया में चमत्कार किए जाते हैं और भारत में तो चमत्कारी व्यक्तित्वों की लंबी कतार हैं किंतु ऐसे चमत्कारों के नाम पर अपने कर्म का रास्ता छोड़कर कृपा के लिए अंधविश्वास के गहरे कुएं में गिर जाना सही नहीं है।
आमजन भाग्य पर या चमत्कार पर भरोसा जब अपने कर्म से बचने के लिए करने लगते हैं तो अंधविश्वास और अंधभक्ति बढ़ने लगती हैं। यह नहीं देखते कि नीम करौली बाबा ने ऐसी सिद्धियां पाने के लिए कितनी कठिन साधना की है। और उस साधना का फल करुणावश दीनदुखियों की सेवा में बांट दिया।
ऐसी सिद्धियां साधक को ही उपलब्ध होती हैं। सिद्धियों का फल प्राप्त करने के लिए तो भीड़ जुटने लगती हैं किंतु उसकी साधना के रास्ते पर जाने के लिए विरले ही आते हैं। जब साधना के रास्ते पर बढ़ते हैं तो पता चलता है कि चमत्कार जैसा कुछ नहीं होता। ओशो कहते थे कि जिस कार्य का कारण जान जाते हैं,वह विज्ञान के दायरे में आ जाता है और जिसका कारण नहीं जान पाते हैं,वह चमत्कार बन जाता है।
कामी मन चमत्कार के पीछे भागता है,साधना के पीछे नहीं; यही दुर्भाग्य है-
'हजारों खिज्र पैदा कर चुकी हैं नस्ल आदम की
ये सब तस्लीम लेकिन आदमी अब तक भटकता है।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹