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🙏आईआईटी बॉम्बे में छात्र की आत्महत्या और प्रोफेसर पर केस के मद्देनजर शिष्य गुरु संबंध के आलोक में एक विश्लेषण 🔥


संवाद


"संवेदना और संवाद के पंख"


संवेदनशीलता और संवादशीलता के पंखों से आकाश में उड़ने वाले शिक्षा रूपी पंछी के पर आज कीचड़ में धंसते जा रहे हैं। तथाकथित नकल प्रकरण में छात्र आत्महत्या कर लेता है और नकल रोकने की कोशिश करने वाले प्रोफेसर पर छात्र के परिजन जातिगत प्रताड़ना का केस दर्ज करा देते हैं। छात्र के मां-बाप की पीड़ा असहनीय है और उनकी त्वरित प्रतिक्रिया को समझने का प्रयास करना चाहिए किंतु राजनीतिक प्रतिक्रिया को देखकर हृदय बहुत व्यथित है। राजनीतिक दृष्टिकोण से जब कभी भी शैक्षिक संबंधों को देखा जाएगा तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई हृदय रोग विशेषज्ञ सीने को चीरकर प्रेम के संबंध को पता करने की कोशिश करे।


"बहुत मुश्किल से बचाई थी जो एहसास की दुनिया


इस दौर के रिश्ते उसे बाजार न कर दे


यह सोचकर नजरें वो मिलाता ही नहीं है


आंखें कहीं जज्बात का इजहार न कर दे।"


            पढ़ाकर जीवन को ऊंचाइयां देने वाले के साथ हार्दिक संबंध होता है। रक्त संबंध भी मन के उस अंधेरे कोने तक अपना प्रकाश नहीं पहुंचा पाता है,जहां तक शिक्षक का प्रकाश पहुंच जाता है।नरेंद्र नाथ दत्त जैसे शिष्य और रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु के आत्मिक संबंध की मैं बात नहीं कर रहा हूं, मैं तो छात्र और शिक्षक के मध्य पनपने वाले बौद्धिक और हार्दिक संबंध की बात कर रहा हूं जिसने मेरे जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ाया।


           शिक्षा का क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जिसमें हृदय पक्ष को गौण कर देने से बहुत महत्वपूर्ण पक्ष खो जाता है। एक शिक्षक की दृष्टि में सभी छात्र समान है किंतु कोई एक छात्र अपने विशेष गुण के कारण शिक्षक के हृदय में प्रवेश कर ही जाता है। इसी प्रकार से छात्र भी कई शिक्षकों के संपर्क में होता है किंतु कोई एक शिक्षक उसके दिलोदिमाग पर राज करने लगता है।


           मेरे को जिन शिक्षकों और सीनियर्स ने पढ़ाया, उनमें से कुछ के प्रति मेरे हृदय में 25-30 वर्षों के बाद भी विशेष आदरभाव उमड़ता है तो मैं पाता हूं कि उनका हृदयपक्ष मेरे हृदय को ज्यादा स्पर्श किया। उन शिक्षकों से प्रेरणा पाकर उनके ऋषि ऋण से मुक्त होने के लिए मैं भी निःस्वार्थ 'शिष्य-गुरु संवाद' चलाता हूं। संवाद के क्षण में पढ़ने वाले की जिज्ञासा और हृदय पर ध्यान जाता है,उनकी जाति पर कभी नहीं। अनेक विद्यार्थियों से संबंध हुआ किंतु एक विद्यार्थी पिछले 25 वर्षों से हर शिक्षक दिवस के दिन अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने अवश्य आता है।प्रिंसिपल जैसे महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने के बाद भी उसमें जो विनम्रता और संस्कार दिखाई देता है,वह उच्च कुल में उत्पन्न होने पर भी विरले ही पाया जाता। मैं तो शिक्षा जगत के इस अनमोल रिश्ते की प्रेम बारिश में भींग जाता हूं।


          सोचने लगता हूं कि ऐसा क्या मैंने इसे विशेष दिया है जिसके कारण इसका हृदय इतनी कृतज्ञता से भरा हुआ है। तब मुझे पता चला कि बहुत सारे विद्यार्थी ऐसे भी हैं जो अपने आदर को व्यक्त नहीं कर पाते। मैं भी अपने शिक्षकों के पास शिक्षक दिवस के दिन अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने नहीं पहुंच पाता किंतु हृदय तो कृतज्ञता के भाव से भरा होता है।


               आईआईटी बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में योग्यता के कारण ही कोई छात्र प्रवेश पाता है और कोई विरला ही वहां प्रोफेसर बन पाता है। क्या ऐसे शिक्षा संस्थान में भी संवेदनशीलता और संवादशीलता की इतनी भारी कमी हो जाएगी कि छात्र आत्महत्या को मजबूर हो जाए और प्रोफेसर पर आत्महत्या के उकसावे का आरोप लग जाए? दोनों ही बातें ह्रदय को बहुत पीड़ा देने वाली हैं। इस पर बहुत गहराई से और सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए अन्यथा एक संबंध जो जीवन को ऊंचाइयां देता है उसके तार तार होते ही हर शिक्षा संस्थान में बहुत कुछ खो जाएगा।


             इंजीनियरिंग कर रहे मेरे बच्चे ने अपने वार्डन के सख्त रुख की कड़े शब्दों में मुझसे शिकायत की। शिक्षक होने के नाते और पिता होने के नाते मैंने बेटे को यह समझाया कि अपने शिक्षक के प्रति अनादर का संबोधन कदापि  उनकी अनुपस्थिति में भी मत करो। शिक्षक और पिता में ज्यादा अंतर नहीं होता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह समझो कि छात्रावास में इतने सारे बच्चों को संभालना कितना मुश्किल है जब हम घर पर अपने एक दो बेटे को ही पूरी तरह संभाल नहीं पाते हैं। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वार्डन या शिक्षक जो कह रहा है वह तुम्हारे लिए प्रेय नहीं है किंतु श्रेय साबित होगा। नियमों से मर्यादा बनती है और मर्यादा का पालन करने वाले श्री राम को भारतीय संस्कृति आदर्श मानती है। बेटा वार्डन पर पक्षपात का भी आरोप लगाता किंतु जब उसे दीक्षांत समारोह में डिग्री मिली तो बेटे ने कहा कि मैं अपने शिक्षक को जैसा समझता था, वैसा वे


नहीं थे और आज कैंपस छोड़ते समय उनके प्रति मेरे दिल में आदर है।


             युवावस्था की एक भावदशा होती है जो विद्रोही किस्म की होती है। यह विद्रोही भाव हॉस्टल में ही नहीं घर में भी देखने को मिल रहा है। उस विद्रोही भाव को प्रेम और ध्यान के द्वारा ही अपने वश में किया जा सकता है। मेरे एक प्रोफेसर साथी के बच्चे ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह बाप की चिंता को सख्ती समझ बैठा और ऐसा ज़ख्म दे गया जिसे इस जीवन में भरा नहीं जा सकता। यह जेनरेशन गैप जब घर में और शिक्षा संस्थान में भी किसी विशेष एक्ट से बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा तो जरा सोचिए यह दुनिया कैसी होगी?


             जब शिक्षकों पर अनेक प्रकार की पाबंदियां होंगी और कानूनी धाराओं का खौफ होगा तो हार्दिक संबंध कदापि विकसित नहीं हो सकता। जिस शिक्षा जगत में सिर्फ बौद्धिक संबंध शेष रह जाए और हार्दिक संबंध का लोप हो जाए तो वह शिक्षा जगत मशीन का निर्माण तो कर सकता है,मानव का नहीं। जिस दुनिया में कोई बड़ी पीढ़ी डांटने वाली न हो और उस डांट को अपनापन समझने वाली कोई नई पीढ़ी न हो, उस दुनिया में कुछ गहरे और अलौकिक रिश्ते नहीं पनप सकते; क्योंकि


"जिसके हृदय जितना समीप है वही दूर जाता है


और क्रोध आता उस पर ही जिससे कुछ नाता है।"


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹