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🙏राष्ट्रीय सेवा योजना दिवस के आलोक में सेवा पर एक विचार 🔥


संवाद


"विचार सेवा सर्वश्रेष्ठ"


सेवा पर जोर देने के लिए 'राष्ट्रीय सेवा योजना' दिवस 24 सितंबर को हम मनाते है और शिक्षा-संस्थानों के माध्यम से स्वयंसेवकों की एक पीढ़ी तैयार की जाती है। अनुभव में यह आ रहा है कि जनसेवक,लोकसेवक और धर्मसेवक दुनिया में जितना ज्यादा बढ़ते जा रहे हैं, उतना ही ज्यादा सेवा शब्द बदनाम होता जा रहा है। खासकर जनसेवकों में भ्रष्टाचारी और दुराचारी की संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि हमारी संसद और विधानसभा प्रश्नों के दायरे में आ गई हैं। नाम सेवा का दिया जाता है किंतु ध्यान मेवा पर रहता है। परिणामस्वरुप जनता गरीब होती जा रही हैं और जनप्रतिनिधि अमीर होते जा रहे हैं।


            इसके अनेक कारणों में से एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि अन्न सेवा,श्रम सेवा इत्यादि पर तो बहुत जोर दिया गया किंतु विचार सेवा को उतना महत्व नहीं दिया गया। भारतीय संस्कृति में अन्नदान से ज्यादा जोर विद्यादान पर दिया गया है क्योंकि अन्न से क्षणिक तृप्ति होती है और विद्या से स्थायी तृप्ति होती है-


'अन्नदानं महादानं विद्यादानं महत्तरम्।


अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्यावज्जीवं तु विद्यया।'


                  सरल शब्दों में कहें तो विद्या से वह आंख मिलती है जिससे हमारी दृष्टि मेवा पर नहीं सेवा पर केंद्रित होती है। इस संदर्भ में विद्यालयों,महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में चल रही शिक्षा की दयनीय स्थिति बहुत विचारणीय हो जाती है। मानव की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विचार की शक्ति है जिसका निर्माण शिक्षालयों में किया जाता है। विचार निर्माण के कारण ही शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है क्योंकि क्लास रूम में वह जिस प्रकार का विचार देता है,राष्ट्र का निर्माण उसी प्रकार का होता है।


             बुद्ध का करुणा विचार,महावीर का अहिंसा विचार, शंकराचार्य का अद्वैत विचार, गांधी का सत्याग्रह विचार और अंबेडकर का सामाजिक-न्याय का विचार क्लास रूम के माध्यम से नई पीढ़ी के दिलोदिमाग में प्रवेश करता है। इन विचारों के कारण ऐसे सेवाभावी लोग जगत को मिले हैं जिन्होंने सेवा की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।


               अनुभव,अध्ययन,चिंतन,मनन और ध्यान से गुजर कर जब स्पष्ट दृष्टि विकसित होती है तो हमारी संस्कृति ने उसे 'विचार' कहा है। इसीलिए विचार पर जोर देते हुए कहा गया है-


'बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताए


काम बिगाड़े आपना जग में होत हंसाय‌।'


             विचार का मुख्य केंद्र संसद में आज कई बिल बिना चर्चा के पास हो जाते हैं जिसका परिणाम यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे महत्वपूर्ण बिल से शिक्षा जगत में बहुत बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आना चाहिए था किंतु ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा की दुर्दशा आज जगजाहिर है।शिक्षा-केंद्र अब तो अवसाद और आत्महत्या के केंद्र में तब्दील होते जा रहे हैं।


            संविधान निर्माण के दौरान भारत की प्रतिभाओं ने हर विषय पर जितनी गहरी विचार प्रणाली को अपनाया , उस विचार प्रणाली का निर्माण उनके शिक्षकों द्वारा क्लास रूम में किया गया था। आज उस संविधान को समझने की तो छोड़िए पढ़ने की भी क्षमता आम नागरिक में नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि शिक्षकों को गैर शैक्षिक कार्यों में इतना नियोजित कर दिया गया है कि शिक्षालय विचार शून्य बनते जा रहे हैं।


           भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि कहती है -'आ नो भद्रा: क्रतवो यंतु विश्वत:' अर्थात् हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी विचार आएं। लेकिन जब हम विचारों की सेवा करने वाले शिक्षकों को श्रमदान,अन्नदान,जनगणना,पशुगणना जैसे कार्यों में लगा देंगे तो सृजनशील विचार कहां से आएंगे? गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि गुरु के पास जाकर प्रणाम करके, प्रश्न करके और सेवा करके सीखो,तब तुम्हें तत्व ज्ञान प्राप्त होगा-


'तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।


उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।'


             गुरुकुल में दिए गए विचारों से शिष्य यह जान पाता था कि 'आत्मवत् सर्वभूतेषु य:पश्यति स पंडित:' फिर वह किसी के साथ भेदभाव और अन्याय नहीं कर पाता था। गुरु के मन, वचन और कर्म की एकता ऐसी होती थी कि शिष्य का पूरा जीवन बदल जाता था। प्राचीन कालीन शिक्षा पद्धति में गुरु के सान्निध्य में अहर्निश बैठने वाले शिष्य आज के जमाने में अपने शिक्षक के साथ क्लास में भी नहीं बैठ रहे हैं। शिक्षा के प्रति व्यावसायिक दृष्टि ने एक तरफ आम जन की पहुंच से शिक्षा को बाहर कर दिया और दूसरी तरफ विचार निर्माण करने वाली शिक्षा को धन निर्माण में लगा दिया।


           विचार सेवा को सर्वश्रेष्ठ सेवा मानते हुए नालंदा विश्वविद्यालय जैसे श्रेष्ठ शिक्षा केंद्रों को पुनर्जीवित किए बिना भारत जीवंत नहीं होगा।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹