🙏गांधी शास्त्री जयंती की शुभकामना🙏


साधारण मोहन को असाधारण बताने वाले प्रतिभाशाली लोग थे। उनकी नजरों में मजबूती का नाम महात्मा गांधी हैं। कुछ लोगों ने मजबूरी का नाम महात्मा गांधी बताया-एक दृष्टि


संवाद


'महात्मा मजबूरी हैं या मजबूती'


गांधी-मूल्यों से जितना हम दूर जा रहे हैं, उतना ही ज्यादा असत्य-घृणा-हिंसा से जीवन और जगत संकट में घिरता चला जा रहा है। जैसी बातें सोशल मीडिया पर महात्मा के बारे में लिखी जा रही हैं, कभी हमने सोचा नहीं था कि अपने राष्ट्रपिता का इतना ज्यादा अपमान इस देश में होगा। उनकी आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट कर उन्हें राष्ट्रपिता और महात्मा मानने से इनकार किया जा रहा है। सभ्य शब्दों में कहें तो गांधी विरोधियों का मानना है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी।


               दूसरी तरफ विश्व में गांधी की महिमा बढ़ती जा रही है तथा संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके जन्म दिवस को 'विश्व अहिंसा दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। विश्व में कई जगह गांधीवादी ढंग से आंदोलन चलाए जा रहे हैं।उन पर नए-नए ढंग से विचार हो रहा है और पुस्तकें लिखी जा रही हैं। प्रसिद्ध प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने पुस्तक का शीर्षक ही दिया है-'मजबूती का नाम महात्मा गांधी'।


                मजबूरी का नाम महात्मा गांधी या मजबूती का नाम महात्मा गांधी इस पर विचार करने से पूर्व आज देश के हालात को हम देखें तो जितनी ज्यादा गंदी गालियां शीर्ष पर बैठे हुए लोगों को सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पर दी जा रही हैं, वह समझ ही नहीं कल्पना से परे हैं। लड़कों को भी लड़कियों ने इस मामले में पीछे छोड़ दिया है। संवैधानिक संस्थाएं इतनी ज्यादा बदनाम होती जा रही हैं कि उनकी साख को गहरा धक्का लगा है। वोट चोरी के आरोप में चुनाव आयोग के विरुद्ध देश गांधी जयंती पर आंदोलित हैं। शिक्षण संस्थाएं अवसाद और आत्महत्या का केंद्र बनती जा रही हैं।


                  कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने गांधी से दूरी बनाकर अपने पतन का रास्ता तैयार कर लिया। गांधी सत्य,प्रेम,अहिंसा जैसे जिन मूल्यों की बात करते हैं, वे फूल के समान कोमल मूल्य हैं। वे हिंसा,घृणा, युद्ध जैसे कठोर पत्थरों के सामने टिक नहीं सकते। फूल और पत्थर में संघर्ष हो तो पत्थर फूल को आसानी से कुचल देगा। लेकिन फूल की कोमलता उसकी इतनी बड़ी शक्ति है कि शायद ही कोई फूल और पत्थर में से स्वयं को पत्थर बनाना पसंद करेगा।कोई कुछ देर के लिए ही सही मगर फूल के समान खिलना चाहता है और अपनी सुगंध से चमन को सुवासित करके अपनी सार्थकता पाना चाहता है।


                 गांधी की आत्मकथा का नाम है-'सत्य के साथ मेरे प्रयोग'। भारत ने अपना राष्ट्रीय वाक्य भी 'सत्यमेव जयते' को चुना है। कोई भी असत्य या झूठ को अपने जीवन का ध्येय नहीं बना सकता क्योंकि मानव जीवन की सार्थकता सत्य के साथ एक हो जाने में है। जो सामान्य मानव की कमजोरियां हैं,वे सभी गांधी में थीं और उन्होंने उसे खुलेआम रूप से अपनी आत्मकथा में लिखकर उस साहस का परिचय दिया है जिसे सामान्य मानव नहीं कर पाता। साधारण मोहन को असाधारण महात्मा बनाने वाला जो गुण था, वह मन,वचन,कर्म की एकता का गुण है। आज  बड़े-बड़े पदों पर पहुंचे हुए लोगों में मन,वचन,कर्म की दूरियां इतनी ज्यादा बढ़ गई हैं कि लोगों की आस्था उनमें न रही।


               गांधी ने प्रार्थना,उपवास,आत्मशुद्धि इत्यादि के द्वारा अपने आप को ही नहीं बल्कि सर्वसाधारण को भी इतना निखारा कि नर हो या नारी, बाल हो या वृद्ध सभी गांधी टोपी पहनकर स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में कूद पड़े। तभी तो टैगोर ने उन्हें 'महात्मा' कहा,सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें 'राष्ट्रपिता' कहा और महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने तो यहां तक कह दिया कि आने वाली पीढ़ियां विश्वास नहीं करेंगी कि हाड़ मांस का ऐसा कोई पुतला कभी इस धरती पर आया था।


            जो महात्मा बनने की साधना नहीं कर सकते, वे  गांधी को गाली देने का काम तो कर ही सकते हैं। किंतु गाली देने का बीज बोने से जो गाली देने वाला वृक्ष पैदा हुआ है, उसकी जिम्मेदारी भी तो लेने का थोड़ा साहस दिखाना चाहिए। विश्वगुरु भारत आज विषगुरु बनता जा रहा है तो गलती कहां हुई है,यह सोचने का शुभ दिन गांधी जयंती है-


'सुधा कल्पनामात्र,गरल का दावा सोलह आना सच है


कभी किसी ने चखा न देखा, केवल नाम चला आता है


पर विष बिकता चौराहे पर जो खाता है मर जाता है।'


                 सत्य-प्रेम-अहिंसा रूपी अमृत को हमने कल्पना मात्र ही नहीं कहा बल्कि गाली देना शुरू कर दिया तो सब जगह झूठ,घृणा,हिंसा ने अपनी दुकान खोल ली। अब लोग उसे खरीद कर खा रहे हैं और मर रहे हैं तथा मार रहे हैं।


गांधी ने कमजोरी के कारण सत्य-प्रेम-अहिंसा को नहीं अपनाया बल्कि भारत की शाश्वत शक्ति होने के कारण उनकी आत्मा को इन मूल्यों ने स्पर्श किया।सत्य-प्रेम-अहिंसा की साधना व्यक्तिगत साधना थी। महावीर ने एकांत में और बुद्ध ने राजमहल छोड़कर जंगल में उस साधना को किया। उसे गांधी ने सार्वजनिक जीवन में उतारने का साहस किया और राजनीतिक आंदोलन में उसका प्रयोग करके ऐसा महान काम किया कि पूरा विश्व गांधी का मुरीद बन गया।


            भारत के राजनेता गांधी की तरह आत्म शुद्धि की साधना नहीं कर सके और असत्य-घृणा-हिंसा में जीने लगे। इससे सत्ता तो मिल गई किंतु सत्य के रास्ते से भटक गए। जिसके कारण आगे ले जाने वाला नेता हमें पीछे धकेलता जा रहा है,जीवन देने वाली शिक्षा जीवन निगलती जा रही है, वोट की रक्षा करने वाला संस्थान वोट की चोरी के आरोप में घिरता जा रहा है और न्याय देने वाला न्यायालय पंच परमेश्वर के रास्ते से दूर होता जा रहा है।


               ऐसे में हम सभी को सोचना होगा कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है या मजबूती का नाम महात्मा गांधी है।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹