🙏विश्व शिक्षक दिवस के आलोक में शिक्षकों की दशा पर एक दृष्टि🔥


संवाद


'गौरव-गरिमा खोता शिक्षक'


विश्व शिक्षक दिवस जो कि 5 अक्टूबर को 1994 से यूनेस्को,यूनिसेफ,अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन, एजुकेशन इंटरनेशनल जैसे महत्वपूर्ण संस्थाओं के समन्वित सहयोग से मनाया जाता है, शिक्षकों की दशा और दिशा पर विचार करने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिवस है। विश्व शिक्षक दिवस 2026 की थीम -“शिक्षकों के साथ खड़े होना: पेशे की सुरक्षा, उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाने और हमारे भविष्य को आकार देने के 60 वर्ष”-इस संबंध में और भी महत्वपूर्ण है।


भारत में शिक्षक की दशा इतनी दयनीय हो गई है कि जो कभी ज्ञान का संवाहक माना जाता था,वह आज सरकारी आदेशों का सिर्फ पालक बनकर रह गया है। नित नए-नए तुगलकी फरमानों से गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबा हुआ शिक्षक अंदर ही अंदर घुटन भरी जिंदगी जी रहा है। वह शिक्षक कम और कर्मचारी ज्यादा हो गया है।


कहने को तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में रटने की जगह विषय को गहराई से समझने, कौशल विकास और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने पर जोर दिया गया है किंतु वास्तविकता यह है कि शिक्षकों की भारी कमी है और सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली के कारण शिक्षा कम परीक्षा ज्यादा हो रही है। शिक्षकों का निर्धारित वेतनमान और शिक्षकों के काम करने का वातावरण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की ओर कदम बढ़ाते प्रतीत नहीं हो रहे हैं। अतिथि शिक्षक और विद्या संबल योजना इत्यादि के द्वारा शिक्षकों की गौरव-गरिमा बढ़ाने की अपेक्षा घटाई गई है। शिक्षा पर निर्धारित बजट घटता जा रहा है और शिक्षक पर शिक्षणेत्तर जिम्मेवारियां बढ़ती जा रही हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि हमारी नई पीढ़ी के हाथ में डिग्री तो है किंतु योग्यता और कौशल नहीं है।


शिक्षकों का एक विशेष वर्ग कोचिंग-शिक्षक महत्वपूर्ण होता जा रहा है और औपचारिक शिक्षक महत्वहीन होता जा रहा है। इसके कारण राष्ट्र निर्माता शिक्षक की भूमिका बदलती जा रही है। जिस शिक्षक का ज्ञान केवल आजीविका कमाने वाला बन जाए उसे महाकवि कालिदास ने ज्ञान का बनिया कहा है-'यस्यागम: केवल आजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदंति'। परिणामस्वरूप जीवन देने वाली शिक्षा जीवन लेने लगी है।विद्यार्थियों में अवसाद और आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं बता रही है कि शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ जो घनिष्ठ और प्रेमपूर्ण संबंध होता था,वह नहीं रहा।


बढ़ते तकनीकी प्रभाव ने शिक्षकों की भूमिका को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। खासकर सूचना क्रांति होने के कारण एआई के जमाने में शिक्षकों से दोहरी अपेक्षा हो गई है। एक तरफ उन्हें अपने सूचना जगत को बढ़ाना है तो दूसरी तरफ उन्हें अपने संवेदना के जगत को और भी व्यापक बनाना है। कारण यह है कि मशीनें कभी भी मन को वह स्नेह और सुकून नहीं दे सकती जो शिक्षक दे सकता है। लेकिन जब शिक्षक प्रतिकूल व्यवस्था होने के कारण स्वयं में अपना विश्वास खोने लगे तो वह सूने हृदय और संकीर्ण मस्तिष्क के साथ विराट हृदय और व्यापक मस्तिष्क वाला विद्यार्थी कहां से तैयार करेगा?


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹