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🙏नमस्तस्यै नमो नमः🙏


एकांतिक साधना की नवरात्रि में देश सामूहिक संघर्ष की ओर उन्मुख हो रहा है।साधकों का यह देश संघर्ष के लिए भी शांतिरूपी देवी की आराधना करता है-एक दृष्टि🔥


संवाद


"साधना की नवरात्रि संघर्ष की ओर"


नवरात्रि का पहला दिन रविवार का दिन था। आद्याशक्ति की पूजा-प्रार्थना के लिए अवकाश का दिन वरदान होता है। कार्यालय से निवृत-व्यक्ति देवालय में प्रवृत्त होने के लिए समय पाकर खुश होता है। किंतु दिल्ली की सड़क पर जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह नवरात्रि के वरदान वाले दिन को भी अभिशापयुक्त बना रहा है। भारतीय संस्कृति के अनुसार वह देवी सभी में चेतना रूप में विद्यमान है और उनके लिए नमस्कार का यह प्रारंभिक दिन था-


'या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते


नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'


           लेकिन कुछ लोगों की चेतना के अनुसार देश की सरकार वोट चोरी से बनी है और कुछ लोगों की चेतना के अनुसार वोट चोरी का मुद्दा भारत को बदनाम करने की साजिश है। जिस चेतना में देवी को स्थापित करके शांति पाने की कोशिश कर रहा था,उसी चेतना में परस्पर विरोधी विचारों को पाकर मन बेचैन हो उठा। आखिर सत्य क्या है,इसका निर्णय कैसे हो?


            संवैधानिक संस्थाओं से जब लोगों की आस्था उठ जाती है तो लोकतंत्र भारी खतरे में पड़ जाता है। आस्थाविहीन जीवन अराजक हो जाता है। संसार की अराजकता को देखकर मन बहुत खिन्न है। थोड़ी देर के लिए देवी के ध्यान में मन लगता है तो शांति मिलती है किंतु ज्यों ही मन अपनी ही पुलिस और अपने ही लोगों के बीच सड़क पर होते हुए संघर्ष को देखता है तो मन फिर से व्याकुल हो जाता है। यह व्याकुलता तब और बढ़ जाती हैं जब वर्दधारी के सहयोग से कुछ बिना वर्दी वाले लोग आंदोलन करने वाले लोगों और पत्रकारों को निशाना बनाते हैं। इससे सरकार की छवि को भारी नुकसान होता है।


               यदि देश में सब कुछ ठीक है तो इतना भारी विरोध क्यों और यदि देश में कुछ भी ठीक नहीं है तो विकल्प क्या है?


'जीवन अपूर्ण लिए हुए पाता कभी खोता कभी


आशा निराशा से घिरा हंसता कभी रोता कभी।'


               नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा होती है किंतु मन पर्वत के समान अविचल होने की जगह घटती घटनाओं के कारण पेड़ के पत्ते के समान दोलायमान है। ऐसे में पर्वत की पुत्री पार्वती की पूजा कहां सार्थक हुई?  बाहर के तूफानों के बीच भी अंतरमन पर्वत के समान अडिग और शांत बना रहे इसके लिए देवी की कृपा जरूरी है। शैलपुत्री ने तपस्या करके शिव को प्राप्त किया था। आज भारत की चेतना को भी 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' की प्राप्ति के लिए उसी साधना से गुजरना होगा जिससे शैलपुत्री गुजरी थीं-


'या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता


नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।'


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹