परों की खोज में परिंदे
October 15, 2026🙏 कलाम साहब को सलाम 🙏
World Student Day के आलोक में आज के सरकारी छात्रों की दशा और दिशा पर एक विचार 🔥
संवाद
'परों की खोज में परिंदे'
कलाम साहब के जन्मदिवस को विश्व छात्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। सरकारी शिक्षा संस्थानों के छात्रों की हालत देखकर हृदय बहुत व्यथित है।
निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाले अब्दुल कलाम रूपी छात्र को सरकारी शिक्षालय में अच्छी शिक्षा मिली और अच्छे शिक्षक मिले। अपनी प्रतिभा और परिश्रम के रहते हुए भी अच्छे सरकारी शिक्षण संस्थान और अच्छे शिक्षक के अभाव में एक सामान्य घर का छात्र उस ऊंचाई को नहीं छू पाता,जिसे कलाम साहब ने छुआ।
मेरे छात्र जीवन के समय में भी सरकारी शिक्षा संस्थानों में शिक्षक प्रतिभाओं को तराशने के काम में लगे रहते थे। जिन घरों के पास निजी शिक्षण संस्थानों में बच्चों को भेजने के लिए पैसे नहीं थे, उन घरों के बच्चे सरकारी शिक्षण संस्थानों से पढ़कर भारत की प्रतिष्ठित परीक्षाओं में पास हो जाते थे और प्रतिष्ठित पदों पर पहुंच जाते थे। गरीब घर के छात्रों का जीवन हमारे समय में संघर्ष से जरूर भरा हुआ था किंतु तनाव उतना ज्यादा नहीं था जितना ज्यादा तनाव आज है। कारण यह था कि मां-बाप की गाढ़ी कमाई कोचिंग-संस्थानों में खर्च नहीं होती थी और हमारे शिक्षक गैर-शैक्षिक-कार्यों के बोझ तले दबे होने के कारण छात्रों से दूर नहीं थे।
आज सरकारी शिक्षालय को कार्यालय बना दिया गया, निजी शिक्षण संस्थान पैसा कमाने का जरिया बन गए और कोचिंग-संस्थानों ने 'सीखने वाली शिक्षा' को "जीतने वाली शिक्षा" के रूप में तब्दील कर गलाकाट प्रतियोगिता का वातावरण पैदा कर दिया जिसने तनाव को हद से ज्यादा बढ़ा दिया। परिणाम हमारे सामने में है कि एक तरफ परीक्षाओं के पेपर लीक हो रहे हैं और दूसरी तरफ छात्र अवसाद और आत्महत्या का शिकार हो रहे हैं। फिर भी विकसित भारत का सपना हम देख रहे हैं।
कलाम साहब ने भी बड़े लक्ष्य और सपने पर बहुत जोर दिया और यहां तक कहा कि 'छोटा लक्ष्य एक अपराध है' तथा "सपने वे नहीं होते जो नींद में आते हैं बल्कि सपने वे होते हैं जो तुम्हें सोने नहीं देते।"
आज बड़ा लक्ष्य गरीब घर के बच्चों के लिए एक अपराध बन गया है। डॉक्टर,इंजीनियर बनने के लिए लाखों की कोचिंग फीस वे कहां से लाएं, करोड़ों में बिकने वाला पेपर वे कहां से खरीदें। आज के सरकारी शिक्षालयों के गरीब बच्चों के आंखों से सपने ही छीन लिए गए हैं। सपना जगाने वाले शिक्षक से आज के छात्र की मुलाकात ही नहीं होती क्योंकि शिक्षक कभी जनगणना तो कभी पशुगणना तो कभी अन्य सूचनाओं को जुटाने में लगा हुआ है।
अब्दुल नामक छोटे बच्चे की आंख में सपने किसने जगाए? एक अय्यर साहब नाम के शिक्षक ने जिन्होंने क्लास में उड़ते पंछी के बारे में पढ़ाने के बाद आकाश में उड़ते पंछी को दिखाने के लिए बच्चों को बाहर ले गए और कहा कि तुम्हारे पास पंख है और सामने में आकाश है, इन पंछियों की तरह ऊपर की ओर उड़ान भरो-
'परों में शक्ति हो तो नाप लो उपलब्ध नभ सारा
उड़ानों के लिए पंछी गगन मांगा नहीं करते।
जिसे मन प्राण से चाहा निमंत्रण के बिना उसके
सपन तो खुद-ब-खुद आते नयन मांगा नहीं करते।।'
आज वही सरकारी शिक्षण संस्थान है,वही सरकारी शिक्षक है किंतु उन्हीं सरकारी शिक्षण संस्थानों से पढ़े हुए लोग भी अपने बच्चों को सरकारी शिक्षण संस्थान में भेजना नहीं चाहते। कारण है कि पढ़ाई का वह माहौल नहीं रहा।इससे भी दुख की बात है कि सरकारी शिक्षण संस्थान की छवि ऐसी बना दी गई है कि मानो वहां पढ़ाई के अलावा और बाकी सारा काम होता है। इसलिए गरीब से गरीब परिवार भी अपना बच्चा सरकारी शिक्षण संस्थान में भेजना नहीं चाहता।
आज हम सरकारी शिक्षकों की पीड़ा यह है कि हमसे क्लास के बारे में और पाठ्यक्रम पूरा करने के बारे में कोई कहीं नहीं पूछता।अब्दुल कलामों को तैयार करने की प्रतिभा रखने वाला सरकारी शिक्षक अपने विषय ज्ञान को भी भूलता जा रहा है क्योंकि विषय ज्ञान के प्यासे छात्र हमसे दूर हो गए और ऊपर के अधिकारियों को हमारे ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं।
अब्दुल का अर्थ होता है 'सेवक' और कलाम का अर्थ होता है 'वाणी'। वाणी का यह धनी सेवक किसी कोचिंग संस्थान में तैयार नहीं हुआ था बल्कि सरकारी शिक्षालय के क्लास में तैयार हुआ था।'क्लास की ओर लौटे बिना' विश्व छात्र दिवस सार्थक नहीं हो सकता। कई कलाम आज पढ़ाई छोड़ रहे हैं, कई कलाम के सरकारी शिक्षण संस्थान बंद हो रहे हैं और कई कलामों को शिक्षक ही नहीं मिल रहे हैं।जहां पर जिज्ञासु छात्र का मिलन ज्ञानी शिक्षक से नहीं होता, वहां कोई 'विद्या का आलय' नहीं होता बल्कि "कार्यालय" होता है। अब्दुल कलाम विद्यालय की देन है, किसी कार्यालय की नहीं।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹