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राजस्थान के चूरू में सरपंची लड़ने से रोका तो पिता 'रामचंद्र' ने अपने इकलौते बेटे बहू को बोलेरो से कुचल दिया-एक विश्लेषण 🔥


"राम की शक्ति पूजा"


रामचंद्र नाम के पिता ने सरपंची के लिए अपने इकलौते बेटे-बहू को बोलेरो से कुचलकर मार डाला जबकि पोती करुणा की भीख मांगती रही। आधुनिक रामचंद्र को अपवाद मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है क्योंकि शक्ति या कुर्सी के प्यासे लोग सबसे पहले अपनी आत्मा को मार देते हैं फिर आत्मज, रक्त-संबंध और जनता बाद में मारी जाती हैं।


                  'राजत्व रक्त-संबंध नहीं जानता' क्योंकि ओशो की दृष्टि में राजनीति मनुष्य की निम्नतम वृत्ति है। हीनता की ग्रंथि से भरे हुए मनोरोगी लोग किसी भी प्रकार से पद पर पहुंचकर अपनी विशिष्टता की घोषणा करना चाहते हैं। इसी कारण बेटों ने बाप की और अपने सगे भाइयों की हत्या करके गद्दी हथियाई है। किंतु शक्ति की भूख इस हद तक जा सकती है कि अपने ही आत्मज को पोती के गुहार लगाने के बावजूद कुचलकर मार दे, यह सोच से परे है। सवाल मन का है जिसके कारण मानव राम भी बन जाता है और रावण भी।


                     यही मन युवराज बनने की बेला में भी पिता के कहने पर युवराज पद को छोड़कर वन की ओर निकल सकता है और सिद्धार्थ गौतम की तरह स्वयं ही राजमहल छोड़कर आत्मज्ञान की खोज में वन को जा सकता है। गद्दी छोड़कर वन की ओर निकलने वाले राम और गौतम आज अपवाद हैं क्योंकि इतिहास लिखने वालों ने सिर्फ सत्तासीन लोगों का इतिहास लिखा है। सत्ता छोड़कर सत्य की खोज में जाने वाले लोगों का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में प्रमुखता से नहीं है, पुराणों में जरूर है।कूरता की सारी सीमाएं लांघकर सत्ता हथियाने वाले औरंगजेब का जिक्र और उसके शासनकाल का बखान विस्तार से इतिहास की पुस्तकों में किया गया है।


               राम मंदिर का निर्माण तो राजनीति द्वारा कर लिया गया किंतु राम का निर्माण कौशल्या के प्रेम और गुरु के ज्ञान के बिना नहीं होता। आज घर-घर में मां-बाप के द्वारा भी महत्वाकांक्षा का बीज बोया जा रहा है और कोचिंग गुरु के द्वारा उस बीज को वृक्ष बनाया जा रहा है। कुर्सियां सीमित हैं और कुर्सी के प्यासे करोड़ों हैं। पद ही पहचान बन गया है। विश्व के सबसे शक्तिशाली पद पर आसीन 'ट्रंप' को आज पद से हटा दो और फिर देखो उनकी गौरव-गरिमा क्या है?काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार के अतिरिक्त उनके पास कौन सा धन है?


            राम की शक्ति पूजा महाप्राण निराला की दृष्टि में उस आंतरिक परमधन के लिए था जिसे पाने के बाद बाहरी धन,पद,प्रतिष्ठा सब गौण हो जाते हैं। देवीपूजा के लिए आवश्यक कमल कम पड़ने पर राम अपनी आंख को कमल की जगह अर्पित करने का संकल्प लेते हैं।शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के चरणों में जब मानव अपनी आंख समर्पित करने का संकल्प कर लेता है तो उसे अपनी आंतरिक शक्ति को जानने की दृष्टि प्राप्त हो जाती हैं।


                'शक्ति व्यक्ति को भ्रष्ट कर देती है' पश्चिमी विचारक लॉर्ड एक्टन का यह कथन अधूरा है। शक्ति राम के पास भी आई किंतु वह शक्ति जनसेवा का माध्यम बनी, भ्रष्टाचार का नहीं। इतिहास लेखन का पश्चिमी दृष्टिकोण युद्धों के इतिहास को ज्यादा महत्व देता है जबकि भारतीय दृष्टिकोण में सेवा,करुणा,जनकल्याण इत्यादि ऐतिहासिक कार्य है,युद्ध नहीं।


             आंतरिक शक्ति को जगाए बिना जब किसी के हाथ में बाहरी शक्ति आती है तो उसका साध्य बदल जाता है जो बाहर का धन पद प्रतिष्ठा होता है। 'प्रजा सुखे सुखं राज्ञ:'अर्थात् प्रजा के सुख में राजा का सुख है, ऐसा दर्शन उसी शासक का हो सकता है जो प्लेटो के रिपब्लिक में दिए गए दार्शनिक राजा की कसौटी पर खरा उतरता हो।


              आधुनिक लोकतंत्र में किसी राजनीतिक पद को प्राप्त करने के लिए न तो बाहरी योग्यता का निर्धारण किया गया है और न किसी आंतरिक योग्यता का महत्व दिया जाता है। पद ही सबसे बड़ी योग्यता है, किस रास्ते से पद प्राप्त हुआ यह गौण है। ऐसे में साधन और साध्य दोनों की पवित्रता को महत्व देने वाले गांधी का यह देश नहीं बन सकता और न उनका रामराज्य का सपना साकार हो सकता है। राम के नाम पर सरपंची पद के लिए सारे मूल्यों को कुचलने वाले रामचंद्र जरूर मिल जाएंगे।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹