हिंसक आंदोलन की आग
October 21, 2026/start
🙏विदेशों में फैले हुए आंदोलन की आग में जल रहे देशों की तरह कहीं भारत देश न झुलसे -चिंता एवं चिंतन 🔥
संवाद
'हिंसक आंदोलन की आग'
विज्ञान के आविष्कारों के कारण विश्व एक गांव बन चुका है। सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के युग में एक देश में हुआ आंदोलन दूसरे देश को अनिवार्यरूपेण प्रभावित करेगा। इतना जरूर है कि फ्रांस का आंदोलन जब भारत में प्रवेश करेगा तो उसमें भारत की आबोहवा का भी असर होगा।
श्रीलंका,नेपाल और बांग्लादेश के बाद विदेशों में फैल रहे आंदोलन की हिंसा ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा कर अपने ही देश का नुकसान कर लिया है और आंदोलन के मुख्य मकसद को कमजोर किया है। इस प्रकार के आंदोलन जितना बढ़ेंगे उतना ही ज्यादा गांधी का सत्याग्रह और अहिंसा का आंदोलन महत्वपूर्ण होता जाएगा।
यदि शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा दयनीय है तो सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर चलना मुश्किल हो जाएगा। स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान हमारे महापुरूषों ने सामाजिक सुधार का आंदोलन राजनीतिक आंदोलनों के साथ चलाया था। इस हेतु शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार का प्रयत्न किया गया था।
फ्रांस में सितंबर माह में शिक्षकों की कमी, क्लास रूम और विद्यालयों की खराब व्यवस्था को लेकर शिक्षकों के द्वारा शुरू किए गए आंदोलन में विद्यार्थी और अभिभावक जुड़ते गए। साथ ही अन्य मुद्दे भी आंदोलन का रुख बदलते गए।
भारत में सरकारी शिक्षालयों की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद जो बदलाव की आशा थी, वह भी निराशा में बदलती जा रही है। नीतियां अच्छी होने के बावजूद भी संसाधनों की भारी कमी और नीतियों को लागू करने की नीयत सही न होने के कारण नई पीढ़ी गहरे खतरे में है। यदि क्लास रूम में विद्यार्थी नहीं आ रहे हैं तो वे कहां जा रहे हैं,इसकी चिंता सभी को होनी चाहिए। शिक्षा के बिना हो रही परीक्षा और बांटी जा रही डिग्री पर यदि विद्यार्थी आवाज नहीं उठा रहे हैं, अभिभावक चुप हैं और शिक्षक मूकदर्शक हैं तो वह समाज जिंदा नहीं हो सकता। हो सकता है विद्यार्थी को यह बात समझ में नहीं आ रही हो और अभिभावक में भी दूरदृष्टि का अभाव हो किंतु शिक्षक तो सब कुछ समझ रहा है फिर भी कुछ बोल नहीं रहा है तो इससे बड़ा किसी देश का दुर्भाग्य नहीं हो सकता। कबीर कहते हैं-
'सुखिया सब संसार हैं खावे और सोए
दुखिया दास कबीर जागे और रोए।'
फ्रांस में कुछ शिक्षक जागे और उनकी आवाज पर जनता जाग गई। भारत का शिक्षक यह नहीं समझ रहा है कि अतीत में शिक्षकों ने सत्य को प्रकट करके राष्ट्र की कितनी बड़ी सेवा की है। भारतीय संस्कृति में शिक्षक को कभी भी कर्मचारी नहीं समझा गया। कर्मचारी सिर्फ आदेश पालन करता है जबकि शिक्षक आदेश को समझता है,उसकी समालोचना करता है और उसको विचारात्मक रूप से क्रियान्वित करता है।
इससे सरकार और समाज दोनों को बहुत लाभ मिलता है। सरकार को इसलिए लाभ मिलता है कि किसी भी बनाई गई नीति को लागू करने में वास्तविक धरातल पर आ रही चुनौतियों का पता चल जाता है जिसके कारण वह नीति प्रभावी ढंग से लागू हो पाती है। समाज को इस रूप में लाभ मिलता है कि यदि उसकी नई पीढ़ी सोचने समझने की क्षमता से युक्त हो जाए तो परिवार का वातावरण बदलता है और समाज में वैज्ञानिक चेतना का विकास होता है। शिक्षक को राष्ट्र निर्माता इसी अर्थ में कहा जाता है कि जहां सरकार बाहर की व्यवस्था बनाती है, वहां शिक्षक दिलोदिमाग को प्रशिक्षित करके अंदर की व्यवस्था बनाता है-
'वे अमीर हैं निजामे जहां बनाते हैं
हम फकीर हैं मिजाजे जहां बदलते हैं।'
संविधान की बात भारत में हर कोई कर रहा है किंतु संविधान का पालन तो तभी हो सकेगा जब पहले उसे पढ़ा जाए,पढ़ाया जाए और नई पीढ़ी को गहराई से समझाया जाए। जिस संविधान को भारत की बड़ी प्रतिभाओं ने वर्षों की अहर्निश मेहनत के बाद विविधतापूर्ण समाज के लिए तैयार किया, उस संविधान की गूढ़ गंभीर बातें नई पीढ़ी को सिर्फ संविधान दिखाने से समझ में आएगी अथवा क्लासरूम में गहराई से पढ़ने-पढ़ाने से समझ में आएगी?
संविधान के नाम पर नारे लगाना,संविधान पार्क बनाना और आंदोलन खड़ा करना तो तुरंत हो जाता है किंतु संविधान में लिखी गई बातों को गहराई से समझना, उस पर सवाल खड़े करना और उसे जीवन में उतारना लंबी और एकांतिक साधना की मांग करता है। वह लंबी और एकांतिक साधना क्लासरूम की साधना होती है।
क्लासरूम की जगह कोचिंगक्लास खड़ा कर दिया गया और शिक्षा का व्यवसायीकरण करके निर्धन प्रतिभाओं की क्षमता विकसित करने से वंचित कर दिया गया। इसके बाद यदि दिग्भ्रमित युवाओं को कोई गुमराह करने में सफल हो जाता है तो उसके मूल में गलती कहां हुई और किसकी हुई? शिक्षालय को कार्यालय बना दिया गया और नई पीढ़ी को नागरिक बनाने की जगह मतदाता
बनाने की पहल शुरू कर दी गई।
शिक्षा विभिन्न धाराओं पर विचार करती हैं चाहे वह वामपंथी विचारधारा हो या दक्षिणपंथी; किंतु किसी विचारधारा को अंतिम नहीं मान लेती है। शिक्षा प्रश्न खड़े करने का साहस सिखाती हैं और उन प्रश्नों का उत्तर खोजने की साधना भी सिखाती हैं। तब भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में एकता की शक्ति आती है।
यदि यह आशंका है कि भारत का आंदोलन हिंसक हो सकता है तो जिम्मेवार वे सभी होंगे जिन्होंने महावीर,बुद्ध और गांधी की अहिंसा को क्लासरूम के माध्यम से जन-जन तक पहुंचने न दिया।
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹