शाकुंतलम् में प्रेम दृष्टि
October 25, 2026🙏प्रेम की इतनी महिमा बताई गई है फिर भी प्रेम आजकल सबसे ज्यादा बदनाम शब्द है क्योंकि प्रेम में पड़कर पति पत्नी को ठिकाने लगा देता है और पत्नी पति को-एक दृष्टि🔥
संवाद
'शाकुंतलम् में प्रेम दृष्टि'
आज के वातावरण में सबसे ज्यादा चर्चा जिन शब्दों की हैं,उनमें सर्वप्रमुख हैं-जेन जी और प्रेम। खासकर प्रेम के नाम पर जो कुछ इधर घटित हो रहा है,उसे सुनकर प्रेम के नाम से ही हृदय घबराने लगता है। तभी तो एक तरफ बेवफाई का दूसरा नाम पुरुष-जाति स्त्री को बताते हैं और दूसरी तरफ स्त्री-जाति नारा लगा रही हैं-'एक कचोरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा' और 'एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय हाय'....
इन सबके बावजूद सत्य यह है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रेम का दायरा फैला है। यदि दो व्यक्तियों में आकर्षण नहीं हो तो काम संबंध के अभाव में राम का जन्म नहीं हो सकता। काम तो प्रकृति की देन है।संस्कृति को विकसित किए बिना प्रेम अस्तित्व में नहीं आ सकता क्योंकि प्रेम न उपवन में उपजता है और न बाजार में बिकता है, उसके लिए तो स्वयं को समर्पित करना पड़ता है-
'प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय
राजा परजा जेहि रुचे, सीस देय लेइ जाय।'
मानव का मन इतना ज्यादा शक्तिशाली है कि ऊर्ध्वगामी होने पर वह प्रकृति का अतिक्रमण करके संस्कृति की ओर उन्मुख हो सकता है और यदि निम्नगामी हो जाए तो विकृति की ओर भी जा सकता है। पशु की एक ही संभावना है प्रकृति में जीना किंतु मानव की संभावना त्रिआयामी है-प्रकृति, विकृति और संस्कृति।
काम प्रकृति है,व्यभिचार विकृति है और प्रेम संस्कृति है। पशु बंधन में रहता है किंतु मानव की संभावना है कि वह बंधन को और विकृत कर सकता है तथा बंधन से मुक्त भी हो सकता है। बंधन कई प्रकार के होते हैं किंतु प्रेम का बंधन अनूठा है क्योंकि काठ के बक्से को छेद करने में समर्थ भौंरा फूल की कोमल पंखुड़ियों में रात भर बंद रहता है-
'बन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेमरज्जुकृतबन्धनमन्यत्।
दारुभेदनिपुणोऽपि षडंघ्रि-र्निष्क्रियो भवति पंकजकोशे।'
इस पृष्ठभूमि में शाकुंतलम् की प्रेम दृष्टि पर विचार करें तो कण्व ऋषि के आश्रम में रहने वाली शकुंतला के सौंदर्य को देखकर राजा दुष्यंत आसक्त हो जाते हैं और शकुंतला भी प्रेम की दृष्टि से घायल हुए बिना नहीं रह पाती। प्राकृतिक आकर्षण को सामाजिक अनुबंध की परवाह नहीं होती और दोनों गांधर्व विवाह कर लेते हैं तथा शकुंतला गर्भवती हो जाती हैं।
ऐसी घटना समाज में आज और बड़े पैमाने पर घट रही हैं क्योंकि वातावरण में कामुक और अश्लील हवाएं ज्यादा घुलमिल गई हैं। इसमें दोष युवाओं से ज्यादा समाज का है। समाज एक तरफ अपनी महत्वाकांक्षाओं के कारण युवाओं के जीवन में तनाव ज्यादा बढ़ा देता है और दूसरी तरफ हर प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री मोबाइल पर सहजता से उपलब्ध करा देता है-
'खिलौनों के बदले में बारूद दी
कि बच्चों में अब गुलफिसानी कहां
जलाकर शमां पूछते हो आप
पतंगों की अब जिंदगानी कहां?'
शाकुंतलम् में कण्व ऋषि योगबल से शकुंतला के गर्भवती होने के बारे में जान जाते हैं फिर भी ऑनर किलिंग का विचार तक नहीं लाते बल्कि उसे अपनी स्वीकृति देते हैं। आज की पुरानी पीढ़ी में इतना बड़प्पन और दूरदृष्टि दिखाई नहीं देती जिसके कारण जेनरेशन गैप इतना बड़ा हो गया है कि एक तरफ परस्पर प्राकृतिक आकर्षण से नई पीढ़ी परेशान है और दूसरी तरफ मां-बाप चौकीदार की भूमिका में आकर उनकी परेशानियों को कई गुना बढ़ा देते हैं-
'जब से तुमसे प्यार हुआ है दुश्मन सब संसार हुआ है
मेरे अपनों का भी मुझसे बदला सा व्यवहार हुआ है।'
दो पीढ़ियों के बीच स्वस्थ संवाद के अभाव में आज की सीता गोयल अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने मंगेतर को ठिकाने लगा देती हैं।
शाकुंतलम् में दुर्वासा के शाप के कारण दुष्यंत सारी बातें भूल जाते हैं और शकुंतला की जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर आ जाती है कि न वह पिता के घर लौट सकती है न पति के घर में प्रवेश कर सकती है। आज दुर्वासा कई रूपों में उपस्थित हैं और चंचल मन दूसरे के साथ-साथ अपने से भी छल करने लगता है।
विरह की अग्नि से गुजर कर अपने प्रेम को बचाए रखने की और उसको जन्म देने की जो हिम्मत शकुंतला ने दिखाई वह आज नहीं दिखती। मिलन को ही पर्याप्त समझने वाला कभी भी वासना से ऊपर उठ नहीं पाता। प्रेम की आराधना वियोग की अग्नि से गुजरे बिना नहीं हो सकती। जब तक तन से गहरे उतर कर मन की गंगा में स्नान नहीं किया जाए तब तक रोम रोम नहीं भीगता-
'फसलें न उगेंगी न कभी प्यास बुझेगी
ये ओस की बूंदे हैं ये बरसात नहीं है
कहते हैं कोई शहर में अब भी है वफादार
हालांकि मेरी उससे मुलाकात नहीं है।'
और जब तक आत्मा की ऊंचाई पर पहुंचने का साहस नहीं दिखाया जाए तब तक प्रेम के आकाश में नहीं उड़ा जा सकता। आत्मज को जन्म देकर शकुंतला ने अपने प्रेम की निशानी को अमर कर दिया जिसके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
मूल सवाल कीचड़ में कमल खिलाने का है। वासना कीचड़ है। कीचड़ में मिट्टी और जल मिला रहता है। तन हमारा मिट्टी है और मन हमारा जल है। इसी व्यक्तित्व में आत्मा भी है जो कमल के समान कीचड़ से ऊपर उठने की क्षमता रखती है। वासना को बढ़ाने का वातावरण तो चारों तरफ दिखाई देता है किंतु आत्मा को पहचानने का प्राकृतिक-आध्यात्मिक वातावरण दुर्लभ हो गया है। इस कारण से प्रकृति विकृति बनती जा रही है और व्यभिचार तथा बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
एक रिपोर्ट कहती है कि लड़कियों की मासिक धर्म की उम्र कामुक वातावरण के कारण कम होती जा रही है, ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि ब्रह्मचर्य आश्रम की गुरुकुल प्रणाली में ऐसा वातावरण भी बनाया गया था कि मासिक धर्म की उम्र अधिक भी की जा सकती है। 25 वर्ष तक कामवासना से दूर रहकर ब्रह्मचारी का जीवन जिया जा सकता था।
जीवन को निम्नगामी बनाने का साधन जब उपभोक्तावादी संस्कृति उपलब्ध करा सकती है तो जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने का वातावरण भी शिक्षा द्वारा उपलब्ध कराया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य है कि जिस शिक्षा ने भारत को विश्वगुरु बनाया था उसी भारत की शिक्षा व्यवस्था में अवसाद और आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में जीवन को ऊंचाइयां देने वाली शाकुंतलम् की प्रेम दृष्टि सिर्फ किताबों में ही बंद है। इस कारण से लोग कहने लगे हैं-
'किताबों में छपते हैं चाहत के किस्से
हकीकत की दुनिया में चाहत नहीं है
जमाने के बाजार में ये वो शै है
जिसकी किसी को जरूरत नहीं है।'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹