🙏राष्ट्रीय एकता दिवस की शुभकामना🙏


राष्ट्रीय एकता दिवस पर जब कभी लौह पुरुष सरदार पटेल भारत को देखते होंगे तो क्या उन्हें राष्ट्रीय एकता का दर्शन होता होगा?-एक दृष्टि🔥


संवाद


"भावनात्मक एकता बढ़ानेवाली शिक्षा"


भारत की राष्ट्रीय एकता को सबसे बड़ा खतरा बढ़ती हुई राजनीतिक प्रवृत्ति से है। लोकतंत्र के नाम पर चल रही शासन पद्धति के अंतर्गत लोगों में लोकतांत्रिक चेतना पद्धति का विकास तो नहीं हुआ किंतु राजनीतिक प्रवृत्ति गांव-गांव और घर-घर तक पहुंच गई है।


             पंचायत चुनाव के दौरान जो आंखों से दिखाई दे रहा है, वह शुभ नहीं है। राजनीतिक दलों द्वारा हर घर में और हर जन में एक महत्वाकांक्षा जगा दी गई है, जिसके कारण वे पदलोलुप और धनलोलुप हो गए हैं। योग्यता की कोई चिंता नहीं सिर्फ लोगों का मत प्राप्त करके धन-पद पाने के लिए हर उपाय करने को हर प्रत्याशी तैयार है।


               मतदाता भी अपनी वोट की कीमत जान गया है लेकिन सही अर्थों में नहीं बल्कि गलत अर्थों में। अतः जो बड़ा प्रलोभन देने के लिए तैयार है,उसके पक्ष में जाने को मतदाता आतुर है। बात विकास की और विचारधारा की नहीं हो रही है बल्कि किससे क्या मिलने वाला है, इसकी हो रही है।


            किसी भी कीमत पर जीत की तैयारी की जा रही है और जब वह जीत नहीं मिलती है तो किसी भी हद तक जाने की तैयारी भी हो रही है। हर गांव में कई पार्टियां बन गई हैं और हर पार्टी में भी कई गुट बन गए हैं, जिसके कारण भय और प्रलोभन की आंधी चल रही है।   


               धर्म,जाति,भाषा,लिंग,क्षेत्र जिस किसी भी आधार पर लोगों को बांटा जा सकता है उसका खेल चल रहा है। ऐसी राजनीतिक भावना के बीच राष्ट्रीय एकता की भावना कैसे विकसित हो सकती है, यह सबसे बड़ा प्रश्न है।


            राष्ट्रीय एकता की भावना लोकतंत्र की सफलता पर निर्भर थी।लोकतांत्रिक चेतना का जितना विकास होता उतना ही ज्यादा राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होता। लोकतांत्रिक चेतना का मतलब है कि परस्पर विरोधी विचारधारा के प्रति कितना ज्यादा सम्मान हमारे मन में है। स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान कांग्रेस में ही कई विरोधी विचारधारा के लोग मिलकर मूल मकसद स्वतंत्रता के लिए काम कर रहे थे। आज स्वतंत्रता के 80 वर्षों के बाद विरोधी विचारधारा को सम्मान करने की जगह मिटाने की बात हो रही है। संसद से शुरू हुई यह बात जब गांव की सड़क तक पहुंच जाए तो राष्ट्रीय एकता की भावना को गहरा खतरा है।


                   सरदार पटेल ने कई रियासतों को हर उपाय से मिलाकर राजनीतिक एकता की नींव रखी थी। उस राजनीतिक एकता को भावनात्मक एकता में बदलने वाली शिक्षा पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाना चाहिए था। सबसे बड़ी दुर्भाग्य की बात यह हुई कि जिस शिक्षा को सबसे ज्यादा महत्व मिलना चाहिए था,वही शिक्षा राजनीतिक प्रवृत्ति वाले लोगों द्वारा सबसे ज्यादा उपेक्षित हो गई। अब तो शिक्षालय भी विशेष राजनीतिक विचारधारा का केंद्र बनते जा रहे हैं जबकि शिक्षा हर धारा पर विचार करने के लिए थी और बेहतर व समन्वित विचारधारा को हमारी आंखों के सामने लाने के लिए थी।


            राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास आध्यात्मिक और वैज्ञानिक शिक्षा के द्वारा ही संभव था। आध्यात्मिक शिक्षा का मतलब हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति में एक ही आत्मा या चेतना है, इसका अनुभव कराने वाली शिक्षा। यह बात दिलोदिमाग में जितनी गहरी बैठाई जाती उतना ही ज्यादा व्यक्ति क्षुद्र सीमाओं से मुक्त होकर विराट बनता। वैज्ञानिक शिक्षा का मतलब है-लौकिक जीवन में सोच विचार की एक पद्धति का विकास किया जाए। आज बढ़ती हुई क्षुद्रता और बढ़ता हुआ अंधविश्वास देखकर ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय एकता की भावना गहरे खतरे में है-


'मूरत संवारने में बिगड़ती चली गई


पहले से हो गया है जहां और भी खराब


रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं


अंधों को रोशनी का गुमां और भी खराब।'


               राजनीति जितना चुनाव को अर्जेंट और अनिवार्य समझती है, उतना ही शिक्षा को यदि अर्जेंट और अनिवार्य समझती तो सरदार का सपना साकार हो गया होता।


'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹