विद्या ज्योति: परम्
November 5, 2026🙏दीपावली की शुभकामना🙏
दीप ज्योति और विद्या ज्योति में अंतर
संवाद
"विद्या ज्योति: परम् "
दीपावली दीप ज्योति का महापर्व है। दीपावली का अर्थ होता है-दीपों की पंक्ति। दीप ज्योति की कतार से बहिर्जगत जगमग हो जाता है किंतु अंतर्जगत का अंधेरा मिटता नहीं है। बाहर में दीप ज्योति की जगमगाहट से अंदर का अंधेरा और घना हो जाता है। अमावस की रात्रि में हम दीपावली मनाते हैं,इसका निहितार्थ यही है कि अंधकार जितना घना हो, प्रकाश की प्यास उतना ही ज्यादा जगती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में ऋषियों ने "विद्या ज्योति:परम् " का उद्घोष किया।
अब समझने की बात है कि दीप ज्योति और विद्या ज्योति में ज्योति तो समान है। फिर भी विद्या ज्योति श्रेष्ठतम है क्योंकि दीप ज्योति को जलाने के लिए बाती और तेल की आवश्यकता होती है जबकि विद्या ज्योति बिन बाती बिन तेल अहर्निश जल सकती है-
'यह किस मुकाम पर ले आई जुस्तजू तेरी
कोई चराग नहीं और रोशनी है बहुत।'
दीप ज्योति तो दिखाई देती है किंतु विद्या ज्योति अदृश्य होते हुए भी सब कुछ प्रकाशित कर देती है।
दीप ज्योति और विद्या ज्योति में कुछ समानता है। दीप ज्योति में दीया मृण्मय है अर्थात् मिट्टी का बना है किंतु ज्योति चिन्मय है। मिट्टी का दीया नीचे मिट्टी में मिल जाता है किंतु ज्योति सदैव ऊपर की ओर जाने को बेताब है। दीया को उल्टा भी कर दो तो ज्योति नीचे की ओर अपना रुख नहीं मोड़ती। मानव का देह भी मिट्टी का है जो एक दिन मिट्टी में मिल जाता है किंतु इस तन में चेतना की ज्योति है जो परमात्मा के यहां से आई है। उस चेतना के आते ही जीवन की शुरुआत हो जाती है और उस चेतना के जाते ही जीवन का अंत हो जाता है-
'वह लेटा था जमीन पर लोग कहते हैं कि मर गया
वह तो बेचारा सफर में था आज अपने घर गया।'
दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे भीतर कुछ है जो मरने वाला है लेकिन मरणधर्मा शरीर के भीतर कुछ ऐसा भी है जो अमर है। जो अपने आप को सिर्फ शरीर समझते हैं वे हमेशा मृत्यु के भय से कंपते रहते हैं किंतु जिन्हें आत्मा या चेतना का ज्ञान हो जाता है, वे अभय को प्राप्त हो जाते हैं। विद्या ज्योति की महिमा यही है कि उसके द्वारा नश्वर में अनश्वर का ज्ञान हो जाता है।
विद्या ज्योति जब बाहर पड़ती है तो पदार्थ में एटम-शक्ति का ज्ञान होता है और जब विद्या ज्योति अंतर्जगत पर पड़ती है तो आत्म-शक्ति का ज्ञान होता है। बहिर्जगत का ज्ञान विज्ञान कहलाता है और अंतर्जगत का ज्ञान धर्म कहलाता है। विद्या ज्योति के जलने पर विज्ञान के द्वारा बाहर के आविष्कार से जगत में क्रांति हो गई। उस विद्या ज्योति से धर्म के द्वारा अंतर्जगत में महाक्रांति हो जाती है।
पदार्थ पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को हम आदर देते हैं किंतु धर्म पर काम करने वाले धार्मिकों को हम परम आदर देते हैं। पदार्थ के ज्ञान को हमारी संस्कृति में अविद्या की श्रेणी में रखा गया है जबकि आत्म ज्ञान को हमारी संस्कृति में विद्या की श्रेणी में रखा गया है। इसी कारण से हमारी संस्कृति में बुद्ध परम आदरणीय हो जाते हैं। अविद्या से हम मृत्यु के पार जा सकते हैं किंतु अमृत की प्राप्ति तो विद्या से ही होती है-'विद्यया अमृतमश्नुते',अतः विद्या ज्योति को श्रेष्ठतम माना गया।
विद्या की ज्योति जल जाए तो सभी में आत्मा या चेतना का दर्शन होने लगता है। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु य:पश्यति स पंडित:' भारतीय संस्कृति में पंडित या विद्यावान होने की कसौटी यही है कि सर्वत्र और सभी में इस आत्मा का दर्शन होने लगे। आज विज्ञान के आविष्कार एटम बम से हिरोशिमा में विनाश हुआ क्योंकि जिनके हाथ में शक्ति आई उनके पास विद्या ज्योति नहीं थी। वैज्ञानिकों के आविष्कार किसी को भी उपलब्ध हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में आत्मज्ञान जिसके पास नहीं हो,उसके द्वारा शक्ति का दुरुपयोग हो सकता है।
आत्मज्ञान को बहुत कम लोग उपलब्ध हो पाते हैं क्योंकि जिस तपस्या के द्वारा यह उपलब्ध होता है उसे हर कोई करने में समर्थ नहीं होता। विद्या ज्योति के जलने पर व्यक्ति परमकरुणावान हो जाता है क्योंकि उसे सब जगह और सभी में उसी एक ईश्वर का दर्शन होता है-
'सबमें तेरा रूप समाया, कौन है अपना कौन पराया'
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹