लक्ष्मीपूजक भारत निर्धन क्यों?
November 8, 2026/start
🙏शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते🙏
लक्ष्मी की पूजा करने वाला भारत निर्धन बना हुआ है जबकि अन्य देश में धन की वर्षा हो रही है,आखिर क्यों?-एक दृष्टि🔥
संवाद
"लक्ष्मीपूजक भारत निर्धन क्यों?"
विश्व में कोई भी दूसरा देश धन की देवी लक्ष्मी की पूजा नहीं करता है। भारत लक्ष्मी की पूजा करता है फिर भी भारत इतना निर्धन है कि 80 करोड़ जनसंख्या कुछ किलो अनाज पर पल रही है। लक्ष्मीपूजक देश यदि इतना निर्धन है तो निश्चितरुपेण मूल सोच में कहीं कोई गड़बड़ी हुई है।
लक्ष्मीपति विष्णु को संसार का पालक कहा गया है। ब्रह्मा जन्म देते हैं और शंकर संहार करते हैं। जन्म देने में और संहार करने में उतना समय नहीं लगता जितना पालन करने में लगता है। जन्म होने के बाद मृत्यु तक पालनकर्ता की जरूरत पड़ती है। दूसरे शब्दों में कहें तो लंबे समय तक परिश्रम की क्षमता विष्णु के पास है अन्यथा पालनरूपी कार्य वे नहीं कर पाते। ऐसे पुरुषोत्तम के लक्ष्मी पैर दबाती है।
भारत परिश्रम की शक्ति को भुला बैठा। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का संदेश सुनाने वाला भारत कर्म को भूलकर भाग्यवादी बन बैठा-
'अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम
दास मलूका कह गए सबके दाता राम।'
उस पर से दरिद्र को नारायण मानकर दरिद्रता को गौरव देने लगा जबकि लक्ष्मी के पति नारायण कहलाते हैं। लक्ष्मीनारायण का यह देश दरिद्रनारायण को महिमामंडित करने लगा तथा धन अर्जित करने वाले उद्योगपतियों की निंदा करने लगा।
दरिद्र को नारायण कहकर और अनपढ़ जनता को जनार्दन कहकर राजनीतिज्ञ तो चुनाव जीतते रहे किंतु भारत हारता चला गया। लक्ष्मी के साथ सरस्वती गणेश का पूजन किया जाता है। इसका अभिप्राय है कि विद्या और विवेक से लक्ष्मी सृजित होती है और संरक्षित रहती हैं। भारत में सरकारी विद्यालय,महाविद्यालय तो कार्यालय बना दिए गए और निजी शिक्षालय धन संग्रहण का केंद्र बनकर रह गए। जहां सरस्वती की आराधना सही ढंग से न हो,वहां विवेक का जन्म भी नहीं हो सकता।
एक समय था कि भारत का व्यापारी वर्ग जहां व्यापार करने जाता था,वहां अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार भी करता था और अपने अर्जित लाभ का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा में लगाता था। इसी कारण से उसे 'श्रेष्ठी' कहा जाता था। आज वह श्रेष्ठी 'सेठ' बन गया क्योंकि उसका धन शिक्षा-संस्कृति की सेवा में नहीं लग रहा। वह तो अब राजनीतिक दलों को चंदा देकर अपने मनमाफिक कानून बनवाता है और देश से कमाया गया लाभ विदेश में जमा करवाता है।
सत्ताधीशों की चिंता भी वैज्ञानिक चेतना वाले भारत का नागरिक तैयार करने की नहीं है बल्कि अपने राजनीतिक दल के लिए वोटर तैयार करने की है। वे नहीं चाहते कि आलोचनात्मक दृष्टि विकसित हो और प्रश्न पूछने वाला नागरिक शिक्षालयों में तैयार हो। अतः 'बांटो और राज करो' के साथ राजनीति ने "पैसा बांटो और चुनाव जीतो" का मंत्र अपना लिया। परिणामस्वरूप मुफ्त में दी जाने वाली सौगातों ने जनता को भिखारी बना दिया।
'कराग्रे वसति लक्ष्मी:' मंत्र कहता है कि कर अर्थात् हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है-
'मेरे हाथों की लकीरों के इजाफे हैं गवाह
मैंने पत्थर की तरह खुद को तराशा है बहुत
जो भी मिलता है मुकद्दर का गिला करता है
और मुझको अपने हाथों पर भरोसा है बहुत।'
संस्कृत के ऋषियों ने इस बात को इतना स्पष्ट रूप से कहा है कि लक्ष्मी न वंश परंपरा से प्राप्त होती है और न आसानी से थाली में परोसी जाती है, वह तो अपने पराक्रम और पुरुषार्थ से अर्जित की जाती है-
"न ही लक्ष्मीः कुलक्रमप्राप्ता, न ही भूषणोलंखितोपि वा
खड्गेनाक्रम्य भुञ्जीत, वीरभोग्या वसुन्धरा ।"
भारत सोने की चिड़िया तभी बना था जब भारत के लोग विदेशों में व्यापार करने गए थे। तभी इतिहासज्ञ प्लिनी अपनी पुस्तक 'नेचुरल हिस्ट्री' में लिखता है कि भारतीय मसाले के बदले यूरोप का सोना भारत में जा रहा है। बाद में हमने समुद्र पार जाना ही निंदनीय बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि समुद्र पार से आकर के विदेशी भारत का धन लूटते रहे और हमें कंगाल बना दिया।
आज भी भारत की प्रतिभाएं विदेशों में जाकर अपने परिश्रम से धन संपत्ति पैदा कर रही हैं किंतु भारत के अधिकांश लोग विद्या और विवेक से हीन होने के कारण लक्ष्मी की पूजा करने के बावजूद निर्धनता में जी रहे हैं। जब तक शंख की पवित्रता,चक्र की न्यायप्रियता और गदा की पराक्रमशीलता को हम नहीं अपनाते तब तक लक्ष्मी की पूजा अधूरी है-
🙏शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तुते🙏
'शिष्य-गुरु संवाद' से प्रो.सर्वजीत दुबे🙏🌹